धन की भूख ने भुलाए रिश्ते सभी,
हर जगह सेंध लगाता, आदमी।
ना जानें कहाँ खॊई, इन्सानियत,
जानवर से भी बदतर हुआ, आदमी ।
धर्म से दूर होता जा रहा है, आदमी।
आदमी को, खा रहा है आदमी ।
हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************
धन की भूख ने भुलाए रिश्ते सभी,
हर जगह सेंध लगाता, आदमी।
ना जानें कहाँ खॊई, इन्सानियत,
जानवर से भी बदतर हुआ, आदमी ।
धर्म से दूर होता जा रहा है, आदमी।
आदमी को, खा रहा है आदमी ।
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सदा से पढते आ रहें हैं कि जब भी कोई महार्षि तप करने बैठते थे तो कोई ना कोई अप्सरा आ कर उन महात्मा महा मुनि का तप भंग करने के लिए नृत्य द्वारा चलाए गए कामुक कामबाणों से उनके तप को भंग कर देती थी।कहते हैं तब वह तपस्वी उस अप्सरा को श्राप दे दिया करते थे।इन बातों को पढ़ पढ़ कर आज पुरूष भी ऐसी सोच रखने लगे हैं।क्यूँ कि आज ही मैने एक लेख पढा था। आपने भी जरूर पढ़ा होगा नारीवादी महिलाएं ? आज इसे पढ कर मुझे पौराणिक कथाएं याद हो आई। लगता है पुरूषों की सोच आज भी वही है जो तब हुआ करती थी। यह बात सभी पर लागू नही होती, बहुतों ने समय के साथ-साथ अपनी सोच को भी बदला है।लेकिन फिर भी अधिकतर अपनी सोच को नही बदल पाए हैं। हम मे से अधिकतर पुरूष निष्पक्षता से विचार नही कर पाते हैं।इसी लिए हमे हमेशा दूसरों में दोष देखनें की आदत हो जाती है। वैसे भी मानव स्वाभाव है कि वह दूसरो की कमजोरियों को जल्दी पकड़ लेता है लेकिन अपनी कमजोरिया उसे नजर नही आती। यह बात दोनों पर लागू होती है। यदि आप किसी नारी को अर्धनग्न देख कर कामातुर हो जाते हैं तो इस में उस नारी का क्या दोष है? हमारे अंदर नग्नता का प्रभाव तभी पड़ता है जब हमारी सोच ऐसी होती है। लेकिन यहाँ मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है कि आखिर नारीयां ऐसे वस्त्र क्यूँ पहनती हैं? इस प्रश्न का उत्तर नारीयां ही दे सकती हैं। बहुत पहले किसी काजी साहब ने शायद किसी चैनल पर कहा था की यदि गोश्त को खुला छोड़ दिया जाए तो बिल्लीयां तो उस पर झपटेगी। उस समय भी मैं काजी साहब से यह पूछना चाहता था कि आखिर बिल्लियां इतनी भूखी क्यों होती है कि उन्हें जहाँ भी गोश्त दिखता है वह उस पर झपट पड़ती हैं? क्या उनका पेट कभी भरा हुआ नही होता?
कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारा जन्म सैक्स के कारण से होता है इसी लिए हम इसे कभी छोड़ नही पाते या यूँ कहूँ-नियंत्रण नही रख पाते? क्या इसी कारण नर में यह कामुकता स्वाभाविक रूप से सदा मौजूद रहती है। ्मैनें कही पढ़ा था कि नारीयों की कामुकता तो माँ बननें के बाद विसर्जित हो जाती है ।लेकिन पुरुषों को यह सोभाग्य प्राप्त नही हो सकता।कही इसी कारण से तो पुरूष अपनी कामुकता को नियंत्रण रखनें में असमर्थ होते हैं? शायद यही कारण होगा ऐसा मुझे लगता है।आप इस विषय पर क्या सोचते हैं मैं नही जानता। यहाँ मैनें वही लिखा है जो मुझे सही लगा।हो सकता है मेरी सोच भी गलत हो......लेकिन आज हम सभी जिस दिशा में बढ़ रहे हैं। वहाँ हमें उन कुछ पुरूषों की मानसिकता को बदलनें के लिए कुछ तो करना होगा। वर्ना आनें वाले समय में समाजिक मुल्य एक कोड़ी का भी नही रहेगा।
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