हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************

Wednesday, September 23, 2009

तेरा खुदा जो कह रहा...


तेरा खुदा जो कह रहा, मेरा खुदा नही मानता।
आदमी को आदमी, कोई नही, यहाँ मानता।

रूतबों औ’ धन से यहाँ, आदमी का मोल है,
आदमी का दिल यहाँ कोई नही पहचानता।

अपनी ही धुन में यहाँ ,चल रहे सब बेखबर,
कितनें गुल पैरों तले, कुचलें, नहीं कोई जानता।

देख सुन खामोंश है दुनिया बनानें वाला भी,
आज दुनिया को परमजीत वो नही पहचानता।

19 टिप्पणियाँ:

वाणी गीत said...

आदमी को आदमी यहाँ कोई नहीं मानता ...आदमी बचे ही कितने हैं ...सब के सब आदमखोर हो गए हैं ..
अच्छी कविता ...शुभकामनायें ..!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

प्रस्तुति बहुत बढ़िया है।
बधाई!

जितेन्द़ भगत said...

अपनी ही धुन में चल रहे सब बेखबर.....
सुंदर पंक्‍ति‍यॉ।

Udan Tashtari said...

बेहतरीन प्रस्तुति!

M VERMA said...

बहुत सुन्दर

AlbelaKhatri.com said...

परमजीत जी,
आठ पंक्तियों के चौंसठ शब्दों में आपने बहुत ही उम्दा काम कर दिखाया है...........

तेरा से आरम्भ हो कर पहचानता तक की यात्रा आपने कराई..........

ज़िन्दगी में और है ही क्या जानने के लिए ?

जिसने तेरा का मर्म पहचान लिया ......उसका मेरा सदा को मिट गया ..और मेरा ही मिट गया तो मेरा दर्द भी मिट ही गया.........

बधाई उम्दा कविता के लिए !

विनोद कुमार पांडेय said...

आज आदमी ही आदमी को भूल गये है..
बहुत बढ़िया ग़ज़ल...बधाई..

वन्दना said...

badhiya prastuti.......badhayi

रश्मि प्रभा... said...

sach me aadmi ka koi mol nahi......bas bhautik suvidhaaon ka lobh hai

ओम आर्य said...

परमजीत जी
बिल्कुल सही कहा आपने आदमी का कोई मोल नही है/बेहद गहरी अभिव्यक्ति!

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर सच्‍चाई को बयां करती यह रचना, आभार

अभिषेक ओझा said...

आदमी को कोई आदमी नहीं मानता ! सच है.

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लिखा आप ने आदमी को आदमी नही मानता,
धन्यवाद

RAJIV MAHESHWARI said...

एक बार फिर....... बेहतरीन प्रस्तुति!

Nitish Raj said...

बहुत ही बढ़िया
आदमी को आदमी कोई यहां नहीं मानता...
बेहतरीन।

Suman said...

sunder kavita hai..........

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

आदमी ने सब कुछ बांट लिये हैं - अपने अपने खुदा भी बांटे सबसे पहले!

Mumukshh Ki Rachanain said...

आदमी की पहचान नहीं, आदमी का मोल नहीं,
होए कुछ भी, रो ले पर मुहं से निकले बोल नहीं

ऐसी ही हो गयी है अब आम आदमी की जिंदगी. बहुत कुछ कह गए आप अपनी इस रचना के माध्यम से.

बधाई.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

संजय भास्कर said...

bahut hi sunder likha hai
aapne



sanjay
haryana

http://sanjaybhaskar.blogspot,com

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