हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************

Friday, November 6, 2009

ऐसा क्यो होता है........

(फोटो अनाम स्त्रोत)

जो बात हमारे अपने देश मे हजारो सालों से मान्य है ,उसी बात को जब विदेशी मोहर लग जाती है तो वह अध्ययन का विषय बन जाती है।.....वर्ना हमारे देश मे ऐसे बातों को मानने वालो को अंधविश्वासी कहा जाता है।

आध्यात्म और विज्ञान-......
पोस्ट लिखी थी। उसी दिन एक पोस्ट और पढ़ने को मिली।लेकिन उस पोस्ट को उस पर ब्लोग मे पढ़ कर अजीब लगा। क्योकि उस ब्लोग को पढ़ कर मुझे हमेशा लगा कि उस का उद्देश्य ही "अंधविश्चास उन्मूलन अभियान है"...पता नही मुझे ऐसा महसूस होता है कि हम स्वयं पर कभी भरोसा नही कर पाते। हम उन बातो को भी प्रमाण मागँने लगते है जो मात्र अनुभव या स्व अनुभूति पर निर्भर करती हैं।लेकिन जब उन्हीं मान्यताओ का अध्ययन उन्नत देश या विदेशी वैज्ञानिक करने लगते हैं तो वह हमारे लिए मान्य होने लगता है। ऐसा क्यो होता है ?आप अपने विचार बताएं।

शेष फिर कभी.......

20 टिप्पणियाँ:

संगीता पुरी said...

न जाने कितने दिनों से मैं खुद भी इसी जिज्ञासा में हूं .. आपको जानकारी मिले तो हमें भी बताने का कष्‍ट करें !!

पी.सी.गोदियाल said...

यही मानसिकता है हमारी बाली साहब ! इसी लिए तो मैंने भी कल अपने ब्लॉग पर न्यूज़ वीक की वह खबर ठेली थी हिंदुत्व के बारे में !

sada said...

बिल्‍कुल सही कह रहे हैं आप ।

नीरज गोस्वामी said...

हमें अपने पे कम और गोरी चमड़ी पर भरोसा अधिक है शायद इसलिए...
नीरज

Aarjav said...

प्रत्यक्ष तौर पर बहुत से मामलॊं में वे हमसे शाक्तिशाली हैं ।(जैसे आर्थिक, सामरिक) । और शक्ति बहुत सारी चीजों का निर्धारक स्वयमेव ही बन जाती है !
दूसरे हमारी मानसिक दुर्बलता तो अपने आप ही में एक कारण है ।

Yogesh said...

खैर बाकी लोगों का मुझे नहीं पता, पर मुझे किसी चीज़ पर अधिक और जल्दी विश्वास होता है, अगर वो मुझे वैज्ञानिक तर्क दे कर समझाई जाये। आप कहते हैं हिप्नोटिज़्म एक अनुभव की बात है, जी नहीं !! सम्मोहन को भी हमारा विज्ञान मानता है, और वह हमारे मस्तिष्क की ही एक अवस्था है।
आप बात घूम फिर कर देश-विदेश पर क्यों ले जाते हैं, विदेश में ऐसे विषयों पर ज़्यादा रिसर्च होती होगी, क्योंकि वहां, काम करने वाले को reward मिलता है। सरकार रिसर्च को support करती है। शायद इसी लिये भारतीय लोग उधर भागते हैं, और वो देश दिन दुगनी रात चौगुनी तरक्की कर रहे हैं

खैर, मुझे लगता है, हम बहस को गलत दिशा में ले कर जा रहे हैं, मुद्दा तो ये था, कि हम लोग किसी बात को तब तक नहीं मानते जब तक हमें उसका वैज्ञानिक रूप से प्रमाण नहीं मिल जाता। हां भई, तो उसमें गलत भी क्या है?

वैसे मैं कोई वैज्ञानिक नहीं हूँ, पर मैं ये मानता हूँ, कि हर चीज़ के पीछे एक कारण एक नियम होता है, बेशक हम उस से अवगत हों या न हों

उदहारण के तौर पर

Newtons laws of motion were in existence since enternity. Its just Newton brought them in front of the world.

Science is not about creating new rules. Its just about discovering the rules that already exist in Nature.
--Don't know the author of this quote.

Anil Pusadkar said...

अंग्रेज़ चले गये मगर्……………।

परमजीत बाली said...

@योगेश जी,आप की टिप्पणी पढ़ कर मुझे यही लगता है कि आपने पिछली पोस्ट ध्यान से नही पढ़ी। विज्ञान और आध्यातम को जानने के लिए उसी के नियम मानने होगें....लेकिन आप विज्ञान के नियमों से ही आध्यातम को परखना चाहते हैं।

जिस प्रकार आप सम्मोहन को विज्ञान मानते है उसी तरह समय पा कर बाकी बातों की तह तक भी विज्ञान शायद पहुँच जाए। सम्मोहन भावनाओं पर आधारित है.....दूसरी बात..सभी को सम्मोहित नही किया जा सकता। जबकि विज्ञान पर आधारित किसी भी कार्य को किया जाता है तब उन सभी क्रियाओ का परिणाम एक-सा ही आता है। यह बात अलग है की विज्ञान उसे तब भी विज्ञान के अंतर्गत मानता है।

आप कहते हैं कि बात विदेश की क्यों करते है......उस का कारण यही है कि सभी अविष्कार अधिकतर विदेशी्यो ने किए हैं... आप जो भी तर्क देते है वह विदेशियों द्वारा स्थापित किया हुआ है।यहाँ यह नही कह रहा कि वह गलत है।

आप कहते है कि " हरेक क्रिया के पीछे एक कारण एक नियम होता है,बेशक हम उससे अवगत हो या ना हो"

यही बात तो कही जा रही है यहाँ, कि जिस बात से विज्ञान अभी अवगत नही है वह उसे इंकार करता रहा है।
जबकि वह कई लोगों द्वारा अनुभव की गई हैं....अब यदि वे बातें विज्ञान की पकड़ से बाहर हैं,उस के नियम से बाहर हैं तो यह तो नही माना जा सकता कि वह बातें होती ही नही।यहाँ इसी बात को कहा जा रहा है।

रश्मि प्रभा... said...

कानून की देवी आँखों पर पट्टी बंधे रहती है,सबूत बिना कुछ नहीं सुनती,वही बात है.......खुद पर , सत्य पर भरोसा शोध से करते हैं

Rajey Sha said...

उपस्‍थि‍त।

ज्ञानदत्त पाण्डेय| Gyandutt Pandey said...

आप आजकल के फैशन के खिलाफ लिख रहे हैं! :-)

अक्षय-मन said...

आपने सही कहा हमें खुद पर विश्वास नहीं है....न खुद जैसों पर इसकी वजह है हम जब तक खुद को कम आंकंगे तब तक हम खुद पर विश्वास नहीं कर पाएंगे और अंधविश्वासों मै घिरे रहेंगे...इसके लिए हमें खुद को पहले उठाना होगा.......

माफ़ी चाहूंगा स्वास्थ्य ठीक ना रहने के कारण काफी समय से आपसे अलग रहा

अक्षय-मन "मन दर्पण" से

महावीर said...

बाली साहब
असल में एक हज़ार सालों की गुलामी ने हमारे दिमाग को हीनता के भाव ने ऐसा जकड़ लिया है कि हमारी सभ्यता और संस्कृति को हीन समझने लगे हैं और उसपर भौतिकीकरण के कारण मस्तिष्क आर्थिक चमक दमक से आगे कुछ देख ही नहीं पाता. इसी को मापदंड मान लेते हैं.
महावीर शर्मा
http://mahavirsharma.blogspot.com
मंथन
http://mahavir.wordpress.com

सुलभ सतरंगी said...

विदेशों में (उन्नत देशो में) सरकार रिसर्च को support करती है। यह बात सही है.

Mrs. Asha Joglekar said...

कहते हैं ना घर की मुर्गी दाल बराबर । हमारी धारणाओं को पाश्चिमात्य जब तक न सराहें हमे तो वह मम्बो जम्बो ही लगता है । पर उम्मीद की किरण है, आस्था तो लोगों में जीवित है चाहे वे इसे सरे आम स्वीकार न करें ।

sandeep sharma said...

यह हमारा दुर्भाग्य ही है....

JHAROKHA said...

apaka kahana ekdam sach hai .main bhee apkee bat se sahamat hoon.
Poonam

creativekona said...

Adaraneeya Bali sahab,

Videsh ka thappa lage bina to mujhe lagata hai ab bharat men kuchh bhee sambhav naheen----yahan ke logon kee kuchh aisee manasikata hee banatee ja rahee hai.
Hemant Kumar

अशोक कुमार पाण्डेय said...

्सवाल देश-विदेश का नहीं प्रामाणिकता का है।
मेरा मानना है क्यूं,कैसे और क्यूं यही कि परिधि से बाहर कुछ भी नहीं है। स्वानूभूत हो या कुछ और… हर परिघटना तर्क की कसौटी पर कसी जानी चाहिये।

श्याम कोरी 'उदय' said...

... ये अपना "इंडिया" है, यहां सब की अपनी-अपनी डपली अपना-अपना राग होता है !!!!!

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