Wednesday, June 10, 2009

मुक्तक-माला - १८

हर तरफ आग ही आग है, कौन बुझाए ?
ऐसे जहाँ मे, कैसे कोई, घर बसाए ?
जिसनें कोशिशें की ,वह हार गया,
राख के ढेर में मुँह अपना कैसे छुपाए ?

रोशनाई हो जहाँ में,दीया जलाया है।
अन्धेरों को उजालों से सजाया है।
पता ना था,इन्सा के भीतर अंधेरा है,
ख्याल किसी को क्यूँ ना आया है?