हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें।
Monday, June 7, 2010
कुछ लघु कविताएं- क्षणिकाएं
अबला
जब तक तुम
अपने आप को
दूसरों के दर्पण मे
देखना चाहोगी।
तुम अबला ही कहलाओगी।
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प्रेम या कर्ज
तुम को सँवारनें मे
मैने अपना जीवन
होम कर दिया।
अपनी खुशीयां देकर
तुम्हारा गम लिआ।
वह प्रेम था तो.....
इस बात को भूल जाओ।
कर्ज था तो....
अपनी गलती पर पछताओ।
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चालाकी
सच
कड़वा या मीठा
नही होता।
भाव उन्हें बना देते हैं।
सच कड़वा हो तो...
दूसरों के लिए।
मीठा हो तो...
अपना समझ खा लेते हैं।
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