कोई अज्ञात भय
जो सदा रहता है घेरे चारो ओर
उसी से बचनें की आशा में
हम बस भागते रहते हैं।
नही जानते कहाँ जाना है,
कहाँ जा रहे हैं?
इन दिशाविहीन रास्तों पर,
जो कभी हमें कहीं पहुँचाते भी नही,
इन पर चलते हुए ऐसा महसूस होता है-
हम एक ही जगह खड़े-खड़े,
कदमताल करते रह जाते हैं।
जहाँ से चले थे
वहीं अपनें को पाते हैं।
लेकिन सब प्रयास करनें पर भी,
भय नही मिटता!
हमारे सारे प्रयास
इसी भय से मुक्त होनें की खातिर
हमें और भी भटकाते हैं,
हमारा भय को और भी बढाते हैं।
आओ! सब मिलकर
इस अज्ञात भय में कूद जाएं।
मिलकर एक नया
आनंद उत्सव मनाएं।