******दिशाएं******

हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************* *************************************************************************************************************************************

3/22/2008

होली खेलें कैसे



होली खेलें कैसे नंदलाल ,राधा रूठी रे।
पहले बनूँगी मैं नंदलाल, राधा रूठी रे।

नाची बहुत बंसी पे तेरी,मेरे कान्हा प्यारे।
अब चाहूँ बंसी मैं बजाऊं,नाचें कान्हा प्यारे।
तब चाहे मोहे रंग दे जितना,जैसे कहे मैं नाचूँ,
सदियों से नाच-नाच कर थक गए पैर हमारे।

होली खेले कैसे नंदलाल ,राधा रूठी रे।
पहले बनूँगी मैं नंदलाल, राधा रूठी रे।

मैं ग्वाला बन गाएं चराऊँ,पानी तुम भर लाना रे।
जमनामें नहाओ जब तुम,निवस्त्र तुम्हें सताऊँ रे।
लोक -लाज तज,सुन बंसी मेरी नंगे पाँवों आ जाना,
कैसा लगता कान्हा तब तुम्हे,हम को जरा बताओ रे।

होली खेले कैसे नंदलाल ,राधा रूठी रे।
पहले बनूँगी मैं नंदलाल, राधा रूठी रे।

राधा की इस माँग के कारन, कान्हा चुप-छुप जाए रे।
बड़े-बूढें राधा को बोलॆं ,उलटी गंगा ना, बहाओ रे।
पर राधा नही रूकनें वाली,ह्ठ कब किसनें छोड़ा है,
परमजीत अब कोई आके इन सब को समझाओ रे।


होली खेले कैसे नंदलाल ,राधा रूठी रे।
पहले बनूँगी मैं नंदलाल, राधा रूठी रे।

3/20/2008

वो जब याद आए बहुत याद आए......



सोच रहा था इस होली पर सभी कुछ ना कुछ लिख रहे हैं ।क्यूँ ना मैं भी कोई गीत लिखूँ । यही सोच कर कुछ लि्खना चाह रहा था।लेकिन समझ नही पा रहा था की क्या लिखूँ।पता नही कैसे पुरानें दिन याद आ गए।अपनें पुरानें दोस्तों की याद आनें लगी।.....वह भी क्या दिन थे जब होली के आनें से पहले ही यह तय हो जाता था कि इस बार हमारी टोली को कहाँ कहाँ धावा मारना है।किस से कैसे हिसाब चुकता करना है।होली के आते ही पिछली होली में जिनके हाथों अपनी बुरी गत बनी थी ,इस बार कैसे उन से बदला लेना है।बस यही प्लान बनते रह्ते थे।आज इसी लिए शायद होली के आनें पर मुझे उन की कमी खलनें लगी थी।उन की याद आते ही मैं गीत गुनगुनानें लगा।साथ ही साथ उसे लिखता भी जा रहा था।अभी मैनें चार लाईनें ही लिखी थी।.......मुझे ऐसा आभास हुआ जैसे मेरे भीतर कोई और बैठा हुआ मेरे लिखे का किसी दूसरे रूप में उत्तर दे रहा है। इस लिए उस समय जो लिखते समय,दूसरी पंक्तियां मेरे भीतर आ रही थी,वह भी मैनें लिख ली।अब देखिए कैसे एक दर्द भरा गीत हास्य गीत बन गया। मुझे लगता है यह सब होली का असर है ,जिसनें मेरे भीतर ऐसे भाव पैदा कर दिए।.. ..अब आप वह गीत कैसा बना?....आप भी पढ़ें।


इस होली में रोएंगी आँखियाँ साथी मेरे पास नही।
होली के रंग बहुत हैं महँगें, पैसे मेरे पास नही।
याद में उनकी आँसू बहते,लौटेगें कभी,आस नही।
उधारी खा ,कोई कब लौटाता,ऐसा कोई इतिहास नही।
जिस रंगमें तुमनें रंगा था उस रंग को ना भूल सका,
मुफत खोर खा पी कर कब का, वह किस्सा ही भूल चुका,
अब दूजा कोई रंग चड़ेगा,मुझको ऐसी आस नही।
तुम क्यूँ बैठ ,होली पर रोते,रोनॆं की कोई बात नही,

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इस होली में रोएंगी आँखियाँ साथी मेरे पास नही।
याद में उनकी आँसू बहते,लौटेगें कभी,आस नही।

जिस रंगमें तुमनें रंगा था उस रंग को ना भूल सका,
अब दूजा कोई रंग चड़ेगा,मुझको ऐसी आस नही।

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होली के रंग बहुत हैं महँगें, पैसे मेरे पास नही।
उधारी खा ,कोई कब लौटाता,ऐसा कोई इतिहास नही।

मुफत खोर खा पी कर कब का, वह किस्सा ही भूल चुका,

तुम क्यूँ बैठ के होली पर रोते,रोनॆं की कोई बात नही।

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3/16/2008

अकेलापन



रात अंधेरी
मन डाले फेरी
दूर कही पर
फिर दिख रही है
पड़ी हुई इक
सपनों की ढेरी।

रूकता नही
पल भर भी
बींनने निकला है
बचपन कही
मिल जाए
मन फिर से
खिल जाए
लेकिन
इतनी अच्छी
कहाँ
किस्मत ये मेरी।

जैसे-जैसे मैं
हो रहा बूढा हूँ
फिर पीछे
लौटनें को
मन मेरा करता है
आहें, नित भरता है
जो पीछे छूटा था
वही तो
आगे है
ना जानें फिर भी
क्यूँ ये मन
भागे है
आदत है मेरी।

पल-पल में मेरे शब्द
अर्थ बदल जाते हैं
कल मेरे साथ थे
आज चिड़ाते हैं
सब समय का खेला है
जीवन को मैनें तो
ऐसे ही धकेला है
बिल्कुल अकेला है
कहानी
ये किस की है
तेरी या मेरी।

रात अंधेरी
मन डाले फेरी
दूर कही पर
फिर दिख रही है
पड़ी हुई इक
सपनों की ढेरी।

3/14/2008

नकली दाँत

जब भी वह सामनें से गुजरते थे।
मुस्कराते हुए गुजरते थे।
उन की मुस्कराहट हमेशा मेरे मन को,
एक अजीब -सा सकून दे जाती थी।

ना जाने कितनें बरसो से
मैं उन्हें यूँ ही देख रहा हूँ
वह हर जगह
जहाँ भी वह टकराते थे,
मुस्कताते थे।

लेकिन एक दिन,
जब सड़क पार करते हुए,
मैं एक तेज जाती कार की चपेट में आ गया।
अंधेरा-सा मेरी आँखों मे छा गया।
मैं छिटक कर सड़्क के बीच पड़ा था।
वह फिर मुझे नजर आए
मुझे देख कर
फिर वैसे ही मुस्कराए।
और आगे चल दिए।

उस दिन मैं उन की
मुस्कराहट से बदहवास हुआ।
उन की मुस्कराहट के पीछे छुपे
नकली दाँतों का मुझे एहसास हुआ।

गजल



मुस्कराता-सा हरिक चेहरा यहाँ लगता है।
चहरे पर चेहरा यह, बहुत खूब फबता है।

हम रोज तेरी महफिल में आते थे मगर,
जिक्र हमारा हुआ हो कभी,नही लगता है।

जाम हर बार तुम्हीं थमाते थे, हाथों में,
कहीं मोहब्बत थी ये तुम्हारी, क्यूँ लगता है।

मुस्कराता-सा हरिक चहरा यहाँ लगता है।
चहरे पर चहरा यह, बहुत खूब फबता है।

दर्द दिल में छुपाए यूँ ही हम तो जीए जाएंगें,
इस जमानें का है दस्तूर यही ,क्यूँ लगता है।

नही ऐसा मिला कोई, जो कहे तुम्हारा है,
हरिक शख्स यहाँ अपनें लिए, जीता मरता है।

3/10/2008

कोई बता दे......



धड़्कनें कुछ कह रही हैं आज तुमसे,
प्यार की दुनिया चलो फिर से बसा लें।
दुश्मनों ने जो उजाड़ा घर हमारा,
नींव कुछ गहरी करें,फिरसे बना लें।

ख्वाइशे हर शख्स करता हैं यहाँ पर,
पूरी कहाँ होती सभी की,यह बता दे।
सपनों को सजाना, तमन्ना सभी की,
रूकती नही क्यूँकर ,मुझको बता दे।

सहर हकीकत को ब्यां करता रहा है,
फिर क्यूँ शब में रहते हैं सपने सजाते।
आदमी फितरत कैसे छोडे अपनी,

तन्हाइयों में रहते हैं आँसू बहाते।

भूल जाओ उनको जो छोड़ जाते,
भूलते कैसे हैं ,हमको कोई बता दे।
कर सके जिस दिन,नयी वो सहर होगी
परमजीत ना कोई हमें वह दिन दिखा दे।



3/09/2008

ईश्वर का बेटा


दूर कहीं आसमान से
कोई शब्द बरसाता है।
अपनी मस्ती में वह
अक्सर गाता है।
उस के शब्द
धरा पर बिखर जाते हैं।
जिसे पीर पैंगंबर चुन-चुन कर
अपनी मरजी से सजाते हैं।
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उस दिन जब तुम
आसमान में बैठे
कुछ गा रहे थे
अपनी ही मस्ती में गुम
अपनें को ही अपना गीत
सुना रहे थे।
मैनें तुम्हारे शब्दों को
टूट कर धरती पर बिखरते देखा।
वह जहाँ भी गिरे
फूल बन-बन के खिले।
एक अजीब सी महक
उन से आ रही थी
जिसने मुझे ना मालूम कब
अपनी ओर खींचा।
अपने मोहपाश में भींचा।

इस लिए
मुझे वह जहाँ भी मिले

मैनें उन्हें चुन लिया
जैसा सही लगा
उन्हें बुन लिया।

आज वही शब्द
मुझे मुँह चिढाते है।
ना मालूम
क्यूँ मुझे डराते हैं?

मैंने तो एक गीत
लिखने का प्रयास किया था
सभी पाए रोशनी
इसी लिए जलाया
एक प्रेम का दीया था।

मैं कहाँ जानता था
मेरे दीये से ये
दूजों के घर जलाएगें।
मेरे शब्दों की आड़ में
इक-दूजें को खाएगें।


आज मेरी तरह
वह गीत को सजाने वाला
कही अकेला बैठा
रो रहा होगा।
"काश!मेरा लिखा गीत मिट जाए"
बाँट जोह रहा होगा
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उन्होनें जो सजाया
सभी एक गीत के स्वर हैं
लिखने का ढंग भले
अलग- अलग होगा,
लेकिन जिन्हें वे सुनाना चाहते थे
उन्होनें समझनें मे भूल की
शायद हरिक को
उसके अंह ने टोका।
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इस लिए मैं अब
पीर,पैगंबरों के सजाए गीत
नही गाता।
बस!अब यही है
मुझे भाता।


जब भी कोई गीत गाता है
सुन लेता हूँ ,
क्यूँकि जान चुका हूँ
इन सब की तरह ,
मैं भी तेरा
बेटा ही हूँ।