Thursday, December 11, 2008

पीड़ा


कोई दूसरा पीड़ा दे ,
तो महसूस नही होता ।
अपनो की पीड़ा
बहुत तकलीफ देती है।
ऐसा लगता है मेरी हर खुशी
जलती चिता पर लेटी है।

इसी लिए जब भी
कोई अपना पास आता है।
कोई मीठा-सा गीत गाता है।
चाशनी में लिपटे जहरीले बोल
मुझ को सुनाता है।
सब जानते हुए भी
उन्हें भीतर उतार लेता हूँ।
इसी तरह इस अथाह सागर में
अपनी नौका खेता हूँ।

कई बार अपने से ही प्रश्न पूछता हूँ-
’क्या ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही होता है?"
फिर चारो ओर
उत्तर सुनने की कोशिश करता हूँ।
किसी के पास कोई जवाब नही होता है।
बस इतना ही महसूस होता है।
यहाँ हर इन्सान
मेरी तरह ही रोता है।