Sunday, February 1, 2009

माँ का नया रूप

माँ की परिभाषा
अब बदलने लगी है
अब माँ घर में रह कर
बच्चो को लोरी नही सुनाती ।
अब चार दिवारी
उसे नही सुहाती।

अब वह भी बाहर जा कर
कुछ कमाना चाहती है।
इस लिए बच्चो की जिम्मेदारी
आया को सौंप जाती है।

अब मुन्नु को माँ का चहरा
रात मे ही दिखता है।
अब वह सब कुछ
आया से ही सीखता है।

अब माँ पहले से भी ज्यादा
थकी-हारी आती है।
आते ही पंलग पर सुस्ताती है।
थकान मिटा कर बहुत कम बतियाती है।
फिर रात के खानें मे जुट जाती है।
मुन्नु टुकुर-टुकुर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से
माँ को घर में इधर-उधर दोड़ते तकता रहता है।
अपनी भाषा में बहुत कुछ कहता है।
लेकिन माँ-बाप की व्यस्तता,
कोई कुछ नही कहता है।

मुन्नु जानता है
माँ सदियों बाद अभी-अभी जागी है
अब माँ को नये रूप में
देखने की आदत डालनी होगी।
अब संतानें माँ को ही नही
पुरूष को भी पालनी होगी।

प्यारे मुन्नु!!!
अब माँ का यह नया रूप स्वीकारो!
जरूरत पड़ने पर ही माँ को पुकारो।
जरूरत पड़ने पर ही माँ को पुकारो।