Wednesday, December 26, 2007

एक नयी सुबह का इंतजार

कब से देखता आ रहा हूँ

उन बुढ़ी आँखों में

पानी ही रहता है।

अपनी बहू की कहानी को

खमोशी से कहता है।



ठंड मे ठिठुरती,काँपती-सी,

अपने को फटी शाल से ढाँपती-सी,

लाचार-सी,अक्सर दिख जाती है।

लेकिन ना जानें क्यूँ

मुझे देख मुसकाती है।



लगता है जैसे वह

बहुत कुछ कहना चाहती है,

कह नही पाती।

उसकी कमजोर होती देह देख,

मुझे भी लगता है,

वह भर पेट नही खाती।



हर सुबह,

टूटी खटिया पर बैठी,

करती रहती है,

सूरज निकलने का इंतजार।

शायद कभी सुबह,

उस के लिए भी आएगी।

तब वह उस के साथ,

कहीं दूर निकल जाएगी।



सोचता हूँ,

क्या तब,

इस खाली खाट को देखकर,

उस बहू को कॊई

कहानी याद आएगी?

जो एक दिन,

फिर दोहराई जाएगी।

जब समय की मार से

वह भी हार जाएगी।



समय तो अपनी बात

सभी से कहता,रहता है।

लेकिन

कब से देखता आ रहा हूँ

उन बुढ़ी आँखों में

पानी ही रहता है।