
अब मुझे उड़ने दो!
देखना चाहता हूँ -
उस ऊँचे आकाश के पार
क्या है?
जहाँ वह भी
यह भी और मै भी,
पहुँचने की होड़ में,
एक दूसरे को धकियाते
चल रहें हैं।
लगता है जैसे
जो पहले पहुँचेगा
वही समेट लेगा
सब कुछ।
हम सभी
यही मान कर तो
चले जा रहे हैं शायद।
जब कि जानते हैं ,
आकाश के पार
हम भी ना रहेगें।
क्युंकि वहाँ सिर्फ
आकाश ही रह सकता है।