Tuesday, May 29, 2007

मुक्तक-माला-४



आज कल जो पंजाब मे हो रहा है उनके हालातों को देख-देख कर मै उनको शांती का कोई संदेशा देना चाहता था।पता नही सोचते-सोचते मुझे क्या हुआ कि दिल मे इक टीस-सी उठी और मुक्तक लिखते-लिखते एक गीत-सा बन गया।



बस मे नही हमारे इन की लगाम कसना।
ले आड़ मजहबोंकी ,नित बुनते नया सपना।
बचना है आग से गर , तोड़ों सभी घरौंदें,
फरमान सुना रब तू"बस दिल मे मुझे रखना।"


कही बह रहे हैं आँसू, डर दिल मे है समाया।
मडँरा रहा वतन पे , ये कैसा काला साया।
सेंकनें मे लगे हैं सभी अपनी-अपनी रोटी,
करतूत ने इन्हीं की हर बार है जलाया।


जागो वतनके लोगों,मत बात इनकी मानों।
सियार है सभी ये जरा इनको पहचानों।
गिरगिटसे रंग बदलते, भूखें हैं कुर्सीयों के,
कोई वास्ता धर्म से इनका नही है,जानो।


झोंकेगें आगमे ये,सबको, जरा सम्भलना।
चालोसे इनकी यारों, बचके जरा निकलना।
फँसतेहैं फिरभी यारों, कुछ लोग सीधे-साधे,
अरदास करो रबसे ,हाथ सिर पे रखना।

6 comments:

  1. सही कहा है आपने , देश चेतना जगाने वाली पंक्तियां है ये ...
    मूझे दिशाएँ की हर रचना प्रभावशाली लगी :))

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  2. बहुत विचारपरक मुक्तक हैं, बधाई.

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  3. आपकी कविता सराहनीय है -दीपक भारतदीप

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  4. झंझकोर रहा है वक्त आज कुछ कर दिखाने को उपर से तुम्हारा मुक्तक नये आभास दिला गया…।बधाई!!

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  5. आपकी दुश्चिंता सही है परमजीत जी, किंतु आप की रचना पढ कर आशावादिता भी जगती है कि एसी सोच के कारण ही यह राष्ट्र अपनी बुनियाद को मजबूत कहता है।

    *** राजीव रंजन प्रसाद

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