Wednesday, September 3, 2008

मन नंगा तो हर नारी से पंगा

सदा से पढते आ रहें हैं कि जब भी कोई महार्षि तप करने बैठते थे तो कोई ना कोई अप्सरा आ कर उन महात्मा महा मुनि का तप भंग करने के लिए नृत्य द्वारा चलाए गए कामुक कामबाणों से उनके तप को भंग कर देती थी।कहते हैं तब वह तपस्वी उस अप्सरा को श्राप दे दिया करते थे।इन बातों को पढ़ पढ़ कर आज पुरूष भी ऐसी सोच रखने लगे हैं।क्यूँ कि आज ही मैने एक लेख पढा था। आपने भी जरूर पढ़ा होगा नारीवादी महिलाएं ? आज इसे पढ कर मुझे पौराणिक कथाएं याद हो आई। लगता है पुरूषों की सोच आज भी वही है जो तब हुआ करती थी। यह बात सभी पर लागू नही होती, बहुतों ने समय के साथ-साथ अपनी सोच को भी बदला है।लेकिन फिर भी अधिकतर अपनी सोच को नही बदल पाए हैं। हम मे से अधिकतर पुरूष निष्पक्षता से विचार नही कर पाते हैं।इसी लिए हमे हमेशा दूसरों में दोष देखनें की आदत हो जाती है। वैसे भी मानव स्वाभाव है कि वह दूसरो की कमजोरियों को जल्दी पकड़ लेता है लेकिन अपनी कमजोरिया उसे नजर नही आती। यह बात दोनों पर लागू होती है। यदि आप किसी नारी को अर्धनग्न देख कर कामातुर हो जाते हैं तो इस में उस नारी का क्या दोष है? हमारे अंदर नग्नता का प्रभाव तभी पड़ता है जब हमारी सोच ऐसी होती है। लेकिन यहाँ मेरे मन में एक सवाल उठ रहा है कि आखिर नारीयां ऐसे वस्त्र क्यूँ पहनती हैं? इस प्रश्न का उत्तर नारीयां ही दे सकती हैं। बहुत पहले किसी काजी साहब ने शायद किसी चैनल पर कहा था की यदि गोश्त को खुला छोड़ दिया जाए तो बिल्लीयां तो उस पर झपटेगी। उस समय भी मैं काजी साहब से यह पूछना चाहता था कि आखिर बिल्लियां इतनी भूखी क्यों होती है कि उन्हें जहाँ भी गोश्त दिखता है वह उस पर झपट पड़ती हैं? क्या उनका पेट कभी भरा हुआ नही होता?

कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारा जन्म सैक्स के कारण से होता है इसी लिए हम इसे कभी छोड़ नही पाते या यूँ कहूँ-नियंत्रण नही रख पाते? क्या इसी कारण नर में यह कामुकता स्वाभाविक रूप से सदा मौजूद रहती है। ्मैनें कही पढ़ा था कि नारीयों की कामुकता तो माँ बननें के बाद विसर्जित हो जाती है ।लेकिन पुरुषों को यह सोभाग्य प्राप्त नही हो सकता।कही इसी कारण से तो पुरूष अपनी कामुकता को नियंत्रण रखनें में असमर्थ होते हैं? शायद यही कारण होगा ऐसा मुझे लगता है।आप इस विषय पर क्या सोचते हैं मैं नही जानता। यहाँ मैनें वही लिखा है जो मुझे सही लगा।हो सकता है मेरी सोच भी गलत हो......लेकिन आज हम सभी जिस दिशा में बढ़ रहे हैं। वहाँ हमें उन कुछ पुरूषों की मानसिकता को बदलनें के लिए कुछ तो करना होगा। वर्ना आनें वाले समय में समाजिक मुल्य एक कोड़ी का भी नही रहेगा।

13 comments:

  1. मैं आप से पूरी तरह सहमत हूँ.

    एक आपबीती मेरी भी सुनें.
    मैं एक बार बाज़ार जा रहा था. मैंने एक लड़की को देखा, वह लगभग २४ साल की थी. जींस और टीशर्ट पहने हुए थी. जहाँ तक मेरा अनुमान है, उसने टीशर्ट के नीचे चोली भी पहनी थी पर सब कुछ इतना टाइट था कि हर ‘ पर्वत की चोटी ‘ और ‘ घाटी ‘के दर्शन हो रहे थे. मैं पूछता हूँ कि क्या मेरी सोच गन्दी है या उसका पहनावा.
    सीधा जवाब है पहनावा, मैंने मन ही मन कहा (हरी ॐ ये भारत है या रोम) आज हर जगह अधनंगी लडकियां दिख जाती हैं. कोई इस अपसंस्कृति को क्यों नहीं रोकता !!

    यदि आगे उसका किसी ने रेप कर दिया हो तो , उस बलात्कारी को दोषी कैसे ठहराएंगे !!
    चलिए यदि वह दोषी हो भी तो क्या मेरे मन में काम दुर्भावनाएं जगाने के लिए वह दोषी नहीं मेरा तो मानसिक उत्पीडन उसने किया ही.
    यही कारण है कि जींस पहनी या कु-वस्त्र पहनी लड़कियों से मैं उनकी ओर बिना देखे ही बात करना पसंद करता हूँ, कौन अपना बलात्कार करवाए . जबकि सलवार सूट पहनी लड़कियों के प्रति मैं अति विनम्रता से पेश आता हूँ. बस में सीट छोड़ दूँगा. और कहीं पर भी किसी भी लड़की की सहायता को तैयार रहता हूँ.

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  2. इस विषय पर आप के विचार पढ़े। शास्त्री जी ने गलत ही कहा हो। लेकिन उन्हें इस बात के लिए धन्यवाद कि उन्हों ने इस वि्षय को खोल दिया। कम से कम सब तरह के विचार तो सामने आ रहे हैं।
    महा पंडित राहुल सांकृत्यायन ने अपने तिब्बत यात्रा वर्णन में लिखा है कि वहाँ स्त्रियाँ खुले में संपूर्ण नग्न अवस्था में स्नान कर रही थीं, कोई पर्दा न था पुरुषों से। लेकिन उस से उन के साथ संबंध बनाने का विचार उत्पन्न भी नहीं होता था।

    मुझे लगता है। हमारी सामाजिक बुनावट में ही वह खोट है जिस से यह समस्या उत्पन्न होती है। नारी की नग्नता को दोष देना उसी सामाजिक बुनावट के छल-छिद्रों को प्रदर्शित करता है।

    लोगों को विचार करने दीजिए इस विषय पर। कोई निष्कर्ष शायद निकट भविष्य मे नहीं निकल पाए। लेकिन इस विचार-विमर्श से मन में छुपे विचार तो सामने आएँगे। शायद ये कोई रास्ता कभी दिखा सकें।

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  3. Bhai, aapki baat mujhe bhi theek lagti hai.soundarya ko niharna manav pravratti hoti hai aur sayad sundar dikhna auraton ki aadat. yahan tak sab theek hai parantu sundarta ke naam par mahilayen apna sabkuch dikhane ko betab hon aur baad men uske parinam ke liye aadmi ko koshen to yah galat hi hai. jo ladakiyan jyada modern hain aur jinhen isse koi fark nahin padta unko yah hak nahin hai ki ve dunia ki saari mahilaon ka pratinidhitva karen. Sundarta ke apane apne mayane hote hain.Aa bail mujhe maar jaisa bulava den aur baad men bail ko desh den to koi kya kare?

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  4. http://sarathi.info/archives/1124

    http://sarathi.info/archives/1126
    http://sarathi.info/archives/1131
    http://sarathi.info/archives/1132

    kyuki mae is vishy par niranter asmati prakat kartee rahee hun issii blog par so puneh usii baat ko usii blog par kehna ??

    PAR MAERII GHOR ASHEMATI HAEN

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  5. हकीक़त में हमारा नंगपन, लोलुपता इस प्रकार के लेखों से बाहर आ रही है , कई ब्लाग ऐसे चल रहे हैं जिनमे स्त्री प्रसंग और संसर्ग चर्चा के बहाने ढूंढे जा रहे हैं ! और कड़वी सच्चाई यह भी है की ऐसे लेख पढने वालों की भीड़ कम नहीं है ! हिन्दी ब्लाग्स अभी शैशव अवस्था में है, लोग लिखते समय यह नही सोच पा रहे की लेखन का अर्थ क्या है , यह नही देख पा रहे की उनके इस प्रकार के लेखन के साथ साथ उनका चरित्र भी अमर हो जायेगा ! और उनके इसी चरित्र के साथ, उनके परिवार के संस्कार जुडेंगे ! जिसमें उतना ही स्थान महिलाओं और लड़कियों का है जितना पुरुषों का !
    एक दिन यह दंभ और चरित्र सारे घर का चरित्र बन जाएगा ! ईश्वर सद्बुद्धि दे !

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  6. " i read this article and found that very sensitive issue has been discussed through this post, very well written and described. and i too agree that we should not forget our decency degnity and respect for others while writing any post on blog great thought on a critical subject"
    Regards

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  7. आप जब भी लिखते है उम्दा ही विषय चुनते हैं!

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  8. देखिये हम किसी भी हालत मे शास्त्री जी से ना तो ऐसे विचारो के ज्ञानार्जन की उम्मीद करते थे .ना ही उनके इस प्रकार के बेहूदा विचारो से किसी भी प्रकार सहमत हो सकते. ये जानवरो से ज्यादा गये बीते तर्क या कुतर्क है. सारे जानवर नंगे रहते है पर बहुत कम आपको बलातकारी दिखाई देंगे. कुछ लोग जो मंदिर मे जाकर भी महिलाओ के अंगो को अपनी कपडा भेदी नजर से देखते है ( इस बारे मे महिलाओ की अनूभूती को आप नही समझ सकते) के लिये आप क्या कहे? शास्त्री जी ? खुशंवंत सिंह जैसे लेखक गुरुद्वारे मे जाकर आपनी इस आदत को लिख तक डालते है आप भी ठीक कुछ वैसा ही कर रहे है. ये आपकी नजरे है कि आप अपनी बिटिया को कम कपडो मे देख कर उसे ढंग से रहने को कहे या महेश भट्ट की तरह शादी कर लेता जैसी सोच से नवाजे .
    अब बात महिलाओ के शोषण की - इस मामले मे हम पूरे सहमत है जी , महिलाये महिलाओ का ही नही पुरुषो का भी शोषण करती है ,लेकिन हम इस पर कोई टिप्पनी नही करेगे . हमे भी शाम को घर जाना होता है जी :)

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  9. हाय रे, इस ब्लॉग मण्डली को क्या हो गया है? सभी चरम स्थिति की चर्चा से हलकान हुए जा रहे हैं। आप में से कितने लोग राखी सावन्त की तरह अपनी बेटी या बहन को बनता देखना पसन्द करेंगे? खासकर पहनावे के मामले में। यदि नहीं तो क्यों नहीं?
    इसी प्रकार कितने लोग औरतों और लड़कियों को काले मटमैले कपड़े से आपादमस्तक ढँक कर रखने के पक्ष में हैं। बहुत कम होंगे। फिर क्यों अपना दिमाग और भाषा खराब किए जा रहे हैं? केवल फालतू बहस ही ब्लॉगरी है क्या?

    व्यक्तिगत स्तर पर सबका मत कमोबेश एक ही होगा। मध्यमार्गी।

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  10. ज्जब हमें गुलाब जामुन खिलाई जाती है और हमारे ही सामने कोई रसगुल्ला खा रहा होता है तो ये इंसानी स्वाभाव है कि हम भी अग्रसर होते हैं रसगुल्ले खाने के लिये। हम गुजरे जमाने में पले बढ़े होते हैं जिसमें कि लड़कियों से दूर हमें रखा जाता है स्कूल में और कॉलेज में। जब हम पुराने शहर में एक भी लड़की को स्कर्ट टाइप कपड़े या खुले विचारों वाले स्वाभाव में नही पाते और जब हम उसी शहर के किसी पॉश या नये डेवलप एरिये में जाते हैं तो वहाँ हमें मार्डन पहनावे जो कि हम रात दिन टीवी पर देखते हैं दिखाई देता है तो हम उसे पाने में अपनी प्रगति देखते हैं क्योकि आजकल की जो फिल्में आ रही है उनमें कोई भी अभिनेत्री साड़ी उस तरीके से नही पहनतीं कि जिसमें उनका अंग प्रदर्शन कम हो। लेकिन मै जब भी किसी लड़कियों को देखता हूँ जो अच्छी तरह बन संवर के मॉल में घुमने या बस का इंतेजार कर रहीं होतीं हैं तो मै उसकी ओर आकर्षित होता हँू लेकिन जब मै किसी लड़की को बिना मेकअप के देखता हूंूू जो किसी बॉलीबुड अभिनेत्री को भी मात करती है तो मुझे उस एक सर्वशक्तिमान परमपिता की क्रियेटिव शक्ति पर आश्चर्य होता है जिसने हमें सुंदरता की परख और सुंदरता को देखने का मनुष्य जीवन दिया। यदि आप किसी व्यक्ति या आदमी को कामुक करार देते हैं तो आप अपने निर्णय पर गलत है क्योंकि यदि उसी पुरूष को दक्षिण अफ्रीकी सुंदर और सेक्सी महिलाओं के बीच छोड़ दें तो वह भाग खड़ा होगा । तब आप यह सिद्ध नही कर पायेंगे कि हमारे देश का यह पुरूष अतिकामुक है। हम लोग केवल पुरूषों की बुराईयों में व्यस्त रहते हैँ सीख देते हैं लेकिन उनका क्या जो रात दिन सास बहू वाले सीरियल सभी मनोरंजन चैनल पर दिखा कर ये सिद्ध कर रही हें कि एक महिला के ढेर सारे पति हो सकते हैं, परिवार कैसे बर्बादी के कगार पर लायें आदि

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