Sunday, March 25, 2007

एक रह्स्यमय सत्य घटना

कुछ दिन पहले ही मुझे एहसास हुआ कि मैनें अपनी रूचियों के संबंध में जो बातें लिखी थी। उस से संबंधित कोई भी बात आपके साथ नही बाँटी । इसी लिए एक घट्ना यहाँ लिख रहा हूँ। यकीन मानिए यह बिल्कुल सत्य घट्ना है। इस घटना का संम्बंध मुझ से ही जुड़ा है। बात बहुत बरस पुरानी है । उस समय मेरी उमर पाँच-छे साल के लगभग रही होगी । हम लोग नेता जी नगर मे रहते थे। उन दिनों शादियों का सीजन चल रहा था । हमारे किसी खास अपने रिश्तेदार के घर शादि थी । हमे भी उन का न्यौता मिला था । सो जाना तो जरूरी था । ऎसे मौके कॊ कोई छोडता कहाँ है। शादि भी ज्यादा दूर नही थी । इस लिए सारा परिवार ही चार दिन पहले ही वहाँ पहुँच गया । ताकि शादि की सारी रस्मों मे शामिल हो सके ।
वहाँ पहुँच कर बड़े लोग तो औपचारिकता निभानें मे मशगूल हो गए और मै तथा मेरा बड़ा भाई, अपने हमउमर दोस्तों की तलाश में लग गए । वहाँ दो ग्रुप बन चुके थे सो हम बड़े ग्रुप मे शामिल हो गए ।यहाँ जिस घटना के बारे मे मै बता रहा हूँ, वह शाम के तीन बजे के आस-पास घटी थी ।
हम सभी घर से बाहर आ गए थे। भीतर ज्यादा जगह नही थी । पता नही अचानक क्या हुआ कि सभी सडक पर एक साथ दोड़ने लगे । उन की देखा-देखी मै भी उन के साथ दोड़ने लगा । शायद हम घर से अभी ज्यादा दूर नही गए थे कि अचानक पता नही क्या हुआ कि मै सड़्क पर गिर पडा । जब कि मुझे अच्छी तरह याद है कि ना तो मेरा पैर किसी से टकराया था और ना ही मै ज्यादा तेज ही दोड रहा था। कुछ देर बाद जब मैं खड़ा हुआ तो मुझे ऎसा लगने लगा जैसे ६-७ बज चुके हो । क्यूँकि उस समय मूझे ऎसा ही दिखाई दे रहा था । मेरी आँखों के सामनें ही मेरे बाकि साथी मुझ से काफि आगे निकल चुके थे। मैने उठ कर फिर दोड़ने की कोशिश की,मगर मुझे ऎसा महसूस हुआ जैसे मुझे कोई आदृश्य शक्ति कदम उठाने ही नही दे रही । मेरी मष्तिक ने काम करना ही बन्द कर दिया हो ,मुझे कुछ सूझ नही रहा था कि क्या करूँ ।अपने साथियों को जोर से आवाज देकर रोकने के लिए बुलाने की कोशिश की पर मेरी आवाज इतनी धीमी निकली के जैसे कोई दबी जुबान से बात कर रहा हो। मै परेशानी मे इधर-उधर ताकने लगा । घर वापसी का रास्ता मेरे दिमाग पर बहुत जोर देने पर भी मुझे याद नही आ रहा था । तभी मेरी नजर अपने से कुछ दूरी पर खड़े एक जवान साधू पर पड़ी । जिसने गेरूएं वस्त्र पहने हुए थे। कंधे तक उस के बाल लट्क रहे थे, जो मेरी तरफ एक टकटकी बाँध कर देखे जा रहा था । उस की आँखों से आँखों के टकराते ही मुझे ऎसा मह्सूस हुआ जैसे उस की आँखों से होकर कोई आदृश शक्ति निकल कर मुझे उस की ओर खीच रही हो । (उस की आँखो की चमक को याद कर आज भी मेरे मन मे सिरहन-सी दोड़ जाती है)मैने बहुत मुश्किल से उस की आँखों से अपनी नजर हटाई । अब तक मै समझ चुका था कि मै अपना शादि वाला घर नही ढूढं पाऊंगा । मै रोने लगा । पता नही कितनी देर तक रोता रहा था । मेरा ध्यान तब टूटा जब एक वृद महिला ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझ से मेरे रोनें का कारण पूछा । मैनें उसे अपनी पूरी कहानी सुनाई । वह समझ गई कि यह जिस के घर आया था उस घर का पता इसे मालूम नही ।वह मुझे साथ लेकर अपने घर की ओर चल दी ।
घर पहुँच कर उसने अपने लड़्के को बुला कर काफि देर तक बातें करती रही और अन्त मे कहा-"इसे थानें पहुँचा आओ । इस की किस्मत अच्छी थी जो मै वक्त पर पहुँच गई । वर्ना आज एक मुश्टंडा साधू इसे उठा ले जाता ।" मै उस समय छोटा तो था पर थोडा बहुत तो समझता ही था और मै उस के साथ भी इसी लिए चल पड़ा था क्यूँकि मुझे उस साधू से भय लग रहा था । वह महिला तो शायद अपने किसी काम से उस ओर निकल आई थी । या यूँ कहूँ मेरा भाग्य उस समय मुझ पर मेहरबान हो गया था ।
अपनी माँ के कहने पर वह मुझे थानें ले कर चल पड़ा । जब हम थानें के गेट पर पहुँचे तो अचानक मेरा हाथ उस के हाथ से छूट गया । वह लड़्का जो मुझे थानें ले कर आया था कुछ आगे निकल गया । तभी मेरी नजर फिर उसी साधू पर पड़ी,जिस के भय के कारण मै यहाँ तक पहुँचा था । उस की चमकती आँखों से आँखें मिलते ही, फिर मुझे उस की ओर एक खिचाव-सा महसूस होनें लगा । अभी मेरा पहला कदम ही उस की ओर उठा था (जबकि मै अपने को रोकने की भरसक कोशिश कर रहा था )कि वह लड़्का लौट आया और फिर मुझे झिड़्कते हुए ,हाथ पकड़ कर लगभग खीचंते हुए ,अन्दर थानें मै ले गया । उस ने सारी बात थाने मे बैठे पुलिस वाले को बताई और मुझे वही छोड़ कर लौट गया ।
देर रात गए जब मेरे पिता थानें में मेरे गुम होने की रिपोर्ट लिखाने थानें पहुँचे तो उन्हें मेरे बारे में जानकारी मिली। तब जाकर उन्होने मुझे मेरे पिता को सौपा और मेरी भी जान मे जान वापिस आई।
आज इतने बरस बीतने के बाद भी मै इस घटना को भूल नही पाया और मेरा इस घट्ना को आप को सुनानें का भी एक कारण है । क्यूँकि मै नही चाहता कि कभी किसी बच्चे के साथ ऎसी दुर्घट्ना हो जो मेरे साथ घटी । आप को सावधान करना भी चाहूँगा कि आप कभी भी किसी फकीर, साधू या किसी माँगने वाले की आँखों मे आँखे डाल कर बात न करें । हो सकता है वह आप को सम्मोहित कर रहा हो और आपको किसी प्रकार का नुकसान पहुँचाए । आप अपने घर के छोटॆ बच्चों को भी इन तथाकथित साधूऒं से सावधान रहने की हिदायत जरूर दे ।

6 comments:

  1. रोचक है बालीजी. बहुत कुछ है जो चेतन विश्व के रियाल्म से बाहर है. पर उससे परेशान होना शायद उचित नहीं है.

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  2. हिन्दी चिट्ठासंसार में आपका स्वागत् है. नियमित लेखन हेतु शुभकामनाएँ.

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  3. जीवन में ऐसा बहुत कुछ घटता है जिसको समझना व समझाना कठिन्न होता है।
    घुघूती बासूती

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  4. Aisi Shati ko kaala ilam kehte hai..
    Kisi bi saadu ke paas aisi shakti kaa honna aam baat hai....

    Yeh Baat bilkul sahi hai ki kisi saadu fakir ki aankhoon mein aankhen daal kar nahi dekhna chaiye...

    mere saath isse se bada kissa hua hai....

    99% bachelor

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  5. bahut koshish ki , is rang main to kuchch dikhayi nahi de raha. font color change karo to kuchch tippni bhi de sakoongi

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  6. jab ki mein apne aap ko rokne ki bharkas koshish kar raha tha par


    sahi hai ki saadu fakir ki aankhoon mein aankhein daal ke nahi dekhna chahiye........

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