Wednesday, August 4, 2010

दिल लगा के समझे....


दिल लगा के समझे गम है क्या बला
मगर बस मे कहाँ किसी के दिल कभी रहा।


आईनों के शहर मे वो सूरत करें तलाश
हर आईना अलग है ,यहाँ कौन कब मिला।


जिसे मानते थे अपना हमको गरूर था
वही छोड़ हमको चल दिए सदा कोई कब रहा।


सोचा था याद अब ना तुमको कभी करेगें
किस से करें शिकायत दिल बस मे कब रहा।


कहने को जी रहा है हर शख्स यहाँ खुश है
परमजीत उनसे पूछो  कैसे खुश कभी रहा।