Monday, April 18, 2011

एक विरह गीत.....



जो तूने दिया मुझको लौटा नही पाऊँगा।
अब छोड के तुझको. कहीं नही जाऊँगा।
हर शाख पूछती है आकाश को जब देखे;
तू दूर इतना क्यूँ है कैसे फूल चड़ाऊँगा।

जो तूने दिया मुझको लौटा नही पाऊँगा।
अब छोड के तुझको. कहीं नही जाऊँगा।

हर बार हारता हूँ जब भी बढ़ा मैं आगे।
हर रात सब सोते हैं क्यूँ नैन मेरे जागे।
है हर तरफ अंधेरा भय मन पे छा रहा है;
ऐसे मे भला कैसे मैं तुझ तक आऊँगा।

जो तूने दिया मुझको लौटा नही पाऊँगा।
अब छोड के तुझको. कहीं नही जाऊँगा।

अब राह कोई मुझको तूही जरा बता दे।
कहाँ वो रोशनी है मुझ को जरा दिखा दे।
कहीं खो ना जाऊँ मै इन अंधे रास्तो पर;
जीवन -भर  क्या यूँही ठोकरें... खाऊँगा।


जो तूने दिया मुझको लौटा नही पाऊँगा।
अब छोड के तुझको. कहीं नही जाऊँगा।

 अक्सर मेरे भीतर तू  बोलता रहता है।
मैं सुन नही पाता तू जो  सदा कहता है।
बाहर नही है तुझसे कोई भी शै  यहाँ पर;
पर मैं ना समझ हूँ फिर भूल ये जाऊँगा।

जो तूने दिया मुझको लौटा नही पाऊँगा।
अब छोड के तुझको. कहीं नही जाऊँगा।

21 comments:

  1. जो तूने दिया मुझको लौटा नही पाऊँगा।
    अब छोड के तुझको. कहीं नही जाऊँगा।
    एक सम्पूर्ण पोस्ट और रचना!
    यही विशे्षता तो आपकी अलग से पहचान बनाती है!

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  2. जो तूने दिया मुझको लौटा नही पाऊँगा।
    अब छोड के तुझको. कहीं नही जाऊँगा।
    एक सम्पूर्ण पोस्ट और रचना!
    यही विशे्षता तो आपकी अलग से पहचान बनाती है!

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  3. बाहर नही है तुझसे कोई भी शै यहाँ पर;
    पर मैं ना समझ हूँ फिर भूल ये जाऊँगा।

    सुन्दर अभिव्यक्ति ..

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  4. जो उसने दिया वह तो कोई भी नहीं लौटा सकता
    और वो देने वाला है, देता है और लौटने के लिए नहीं देता है.

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  5. हम सब उसकी कृपा से कृतज्ञ हैं।

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  6. सुंदर भावाभिव्यक्ति।

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  7. बहुत ही खूबसूरत भावमय करते शब्‍द ।

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  8. शानदार, बधाई.
    मेरे ब्लॉग पर आयें, आपका स्वागत है
    मीडिया की दशा और दिशा पर आंसू बहाएं

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  9. बाहर नही है तुझसे कोई भी शै यहाँ पर;
    पर मैं ना समझ हूँ फिर भूल ये जाऊँगा
    bahut khoobsoorat
    sahityasurbhi.blogspot.com

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  10. बाहर नही है तुझसे कोई भी शै यहाँ पर;
    पर मैं ना समझ हूँ फिर भूल ये जाऊँगा।

    समर्पित भाव....

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  11. जो तूने दिया मुझको लौटा नही पाऊँगा।
    अब छोड के तुझको. कहीं नही जाऊँगा।
    बहुत गहरी बात कह दी आप ने इन चार लाईनो मे जी बहुत सुंदर, धन्यवाद

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  12. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....सुंदर पावन भाव

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  13. विरहगीत, मन की भावनाओ का प्रवाह अच्छा लगा। शुभकामनायें।

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  14. भावनाओं की सुंदर अभिव्यक्ति।

    आभार.

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  15. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....सुंदर पावन भाव

    janm din ki bahut bahut badhai

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  16. jidhar dekhti hoon,udhar tu hi tu hai.......bahut badhiya.....thanks

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  17. हर बार हारता हूँ जब भी बढ़ा मैं आगे।
    हर रात सब सोते हैं क्यूँ नैन मेरे जागे।
    है हर तरफ अंधेरा भय मन पे छा रहा है;
    ऐसे मे भला कैसे मैं तुझ तक आऊँगा।----------आदरणीय सर,बहुत ही सुन्दर विरह गीत पढ़वाने के लिये आभार।

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  18. "अक्सर मेरे भीतर तू बोलता रहता है।
    मैं सुन नही पाता तू जो सदा कहता है।
    बाहर नही है तुझसे कोई भी शै यहाँ पर;
    पर मैं ना समझ हूँ फिर भूल ये जाऊँगा।

    जो तूने दिया मुझको लौटा नही पाऊँगा।
    अब छोड के तुझको. कहीं नही जाऊँगा।"

    सुन्दर प्रस्तुति....हर एक मन की यही अवस्था होती है...न हम उस से जुदा है न उसे पहचान रहे है....

    कुंवर जी,

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