Monday, September 5, 2011

कोई अजनबी.......


अब और क्या कहे जब एतबार न हो।
किस से करें शिकायते जब बेवफा वो हो।

बस! निभाते चले गये जिन्दगी के दिन,
वो साथ थे हमारे...   जैसे कोई ना हो।

इस लिए मौजूदगी उनकी नही खली,
खुद गिरे खुद उठ गये थामे भला क्यों वो।
 
हर बार थी उम्मीद मुझको ना जाने क्यों,
दिल में छुपे बैठें हो शायद कहीं पे वो।

जब हमने दिल की बात बताई  यार  को,
देखा उसने ऐसे जैसे कोई अजनबी वो हो।




15 comments:

  1. अजनबी शहर में, अजनबी रास्ते।

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  2. बहुत सुन्दर चित्रण्।

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  3. शानदार प्रस्तुति , आभार

    कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें .

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  4. लाजवाब गजल.. अक्सर ऐसा ही होता है

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  5. bali ji
    bahut hi badhiya v bahut hi shandaar prastuti.ke liye badhai
    bahut dino baad aapke blog par aai hun aswsthta ke karan xhama kijiyega
    dhnyvaad sahit
    poonam

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  6. वाह! दिल की बात बताते ही अजनबी हो गये.सुंदर रचना.

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  7. साढ़े छह सौ कर रहे, चर्चा का अनुसरण |
    सुप्तावस्था में पड़े, कुछ पाठक-उपकरण |

    कुछ पाठक-उपकरण, आइये चर्चा पढ़िए |
    खाली पड़ा स्थान, टिप्पणी अपनी करिए |

    रविकर सच्चे दोस्त, काम आते हैं गाढे |
    आऊँ हर हफ्ते, पड़े दिन साती-साढ़े ||

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  8. बस ! निभाते चले गए जिन्दगी के दिन
    वो साथ थे हमारे...जैसे कोई न हो !

    बहुत सुन्दर...

    "किसी का साथ भी ऐसा हो तो क्या बात है
    कोई साथ न हो के भी साथ हो तो क्या बात है.."

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  9. बहुत बढ़िया...परमजीत...सॉरी...देर से आ पाया.

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  10. baali ji
    bahut hi behtreen dhang se aapne apne mano -bhavo ko abhivykt kiya hai.har panktiyan bahut hi achhi lagin.
    bahut abhut badhai
    poonam

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  11. खूबसूरत प्रस्तुति ||

    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं

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  12. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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