Monday, January 30, 2012

बेशर्मी की हदे.......

वह इस लिये
तड़प रहा था 
प्यास के कारण
क्योकि उसके भीतर
वादाखिलाफी देख कर
आग लगी हुई थी
और आज वह 
पाँच साल बाद 
फिर लौट आया है
उससे अपना समर्थन माँगने।
बेशर्मी की हदे .......
पार करना
इसी को तो कहते हैं।

13 comments:

  1. सही बात है ! दरअसल ये कौम तो भिखारियों से भी निक्रष्ट है. वो बेचारे तो हालात के मारे हैं मगर ये किस के मारे कोई नहीं जनता ? गिरगिट की तरह रंग बदलना कोई इनसे सीखे . हैरत की बात है कि एक बार हाथ जोड़कर भीख मांगने के बाद पांच साल तक इनके दर्शन नहीं होते. यदि होते भी हैं तो वो जनता से ऐसे मिलते हैं जैसे किसी सल्तनत के सुलतान हों

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  2. यह भी एक सच्चाई आज के विकसित समाज की. सुंदर व्यंग. मेरे ब्लॉग पर इसी विषय पर मेरी दो पोस्ट देंखे.

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  3. बहुत सुन्दर सृजन , बधाई.

    कृपया मेरे ब्लॉग "meri kavitayen" पर भी पधारने का कष्ट करें, आभारी होऊंगा /

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  4. ये सिलसिला चलता ही रहेगा क्या कर सकते हैं।

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  5. सटीक व्यंग्य किया है आपने! सुन्दर प्रस्तुती!

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  6. Aaj bahut dino ke baad aapke blog par aai...Rachna ji ke blog ke through. Nice joke of the day!!!

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  7. Every day the lot is crossing new limits. Shamelessness is the first trait for being admitted into their rank. Therefore you can not accuse them for crossing the limits of shamelessness.

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  8. Every day the lot is crossing new limits. Shamelessness is the first trait for being admitted into their rank. Therefore you can not accuse them for crossing the limits of shamelessness.

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