Sunday, April 22, 2012

कोई गलती...


उदास रात गई उदास दिन भी है-
ये कैसी जिन्दगी जी रहे हैं हम।
बहुत दूर  हैं ......मंजिलें अपनी-
साँसों की सौगात लगती है कम।

उदास रात गई उदास दिन भी है-
ये कैसी जिन्दगी जी रहे हैं हम।

मगर जीना होगा चलने के लिये-
सुख-दुख का रस पीनें के लिये।
किसी और की मर्जी लगती है-
बदल सकेगें ना .. इसको हम।

उदास रात गई उदास दिन भी है-
ये कैसी जिन्दगी जी रहे हैं हम।

बहुत सपनें सजाये थे ... हमनें-
कदम-कदम पर रूलाया गमनें।
अपना बोया ही काटना है यहाँ-
कोई गलती क्या कर रहे हैं हम।

उदास रात गई उदास दिन भी है-
ये कैसी जिन्दगी जी रहे हैं हम।

12 comments:

  1. उदास रात गई.........
    सुन्दर शब्द संयोजन के साथ साथ प्रवाहमयी बेहतरीन रचना

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  2. कभी कभी मन में ऐसे भाव भी आते हैं.............और गुजर भी जाते हैं................
    जिंदगी इतनी बुरी भी नहीं होती...............
    :-)

    शुभकामनाएँ.

    अनु

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  3. जिंदगी की डोर किसी और के हाथ में होती है ।
    लेकिन जीना है तो खुश भी रहना पड़ता है ।

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  4. बढ़िया रचना!
    पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएँ!

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  5. सच ही है हम जो बोते हैं वहीँ काटते हैं. प्रशंसनीय प्रस्तुति

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  6. सटीक व सार्थक कथन्।

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  7. बिल्‍कुल सही कहा है आपने ... बेहतरीन प्रसतुति।

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  8. स्नेह के भाव लिये सुन्दर रचना .....आभार एवं शुभ कामनायें !

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  9. सच है सबको अपना बोया ही काटना है ...

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  10. Jindagi wruttakar hai. Har dukh ke bad sukh to aayega hee.
    par yah such hai ki man kabhee kbhee dukh se abhibhoot ho kar aisa sochane lagata hai.
    sunder geet.

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