Saturday, July 12, 2014

चलो! अब कहीं ... और चलते हैं..




 चलो!
 अब कहीं ...
और चलते हैं।
इन घाटों पर
पानी तो है...
लेकिन 
सब ....
प्यासे रहते हैं।
सब की ..
नौकाएं टूटी हैं
पतवार बिना...
बहती रहती हैं।
कैसे करें...
भरोसा इन पर
जो अक्सर 
खुद से हो हारा।
अपने लिये
स्वयं निर्मित करें
विचारों की 
ये नित कारा ।
छोड़ों बन्धन..
सारे तोड़ों..
जो सत्य धरा पर
खरा ना उतरे
कोई हो...
अपना या पराया
सम भाव से
जो नित मुकरे।
ऐसो संग हम क्यूँ..
हामी भरते हैं।
 चलो!
 अब कहीं ...
और चलते हैं।

    




9 comments:

  1. ख्वाहिशें रहनी चाहिए जिंदा हमेशा ...
    ख्वाहिशों को अच्छी तरह सहेजा आपने अपनी कविता में
    सादर !!

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  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, रविवार, दिनांक :- 13/07/2014 को "तुम्हारी याद" :चर्चा मंच :चर्चा अंक:1673 पर.

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  3. कल 13/जुलाई /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  4. बहुत ही गहरे भावो की अभिवयक्ति......

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  5. जो सत्य धरा पर खरा न उतरे। सम भाव से मुकरे।ऐसा संग नही चाहिये यही कहते हैं चलो कहीं और चलते हैं। कहीं और का वह ठौर कहां होगा।

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  6. I was amused once when reading the information you have entered. Hopefully with this information could provide benefit to me and other members. thank you.

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