Wednesday, July 29, 2015

डायरी के पन्नें.....७

                    
         

                            भीतर का संवाद

भय का मूल कारण अंहकार ही होता है। जब तक ये अंहकार किसी भी रूप में भीतर जीवित रहता है भय से मुक्त नही हुआ जा सकता। मन की चंचलता और अंहकार की दृढ़ता जीवन में जीव को बहुत नाच नचाती है। लेकिन ये इन्सान की विवश्ता है कि उसे मन की चंचलता और अंहकार की दृढ़ता को पोषित करना ही पड़ता है। जीवन का आनंद व सुख-दुख इसी अवस्था में अनुभव किया जा सकता है। ऐसा नही है कि मन की चंचलता और अंहकार की दृढ़ता के बिना नही रहा जा सकता....रहा जा सकता है.....लेकिन उस अवस्था को प्राप्त करना हमारे हाथ में नही है। इस अवस्था को प्राप्त कराना प्राकृति प्रदत ही माना जा सकता है। वैसे जीव के प्रयत्न से भी इसे पाया तो जा सकता है ...लेकिन तब वह अवस्था स्थाई नही रह पाती....या यूँ कहे क्षणिक या पल-भर के लिये तो इसका अनुभव किया जा सकता है.....लेकिन इस अवस्था में स्थाई नही रहा जा सकता। वैसे एक बात निश्चित व स्वानुभव महसूस की जा सकती है कि इस क्षणिक अवस्था के प्रभाव के कारण जीव जीवन पर्यन्त सजग तो रहता ही है। जब-जब भी जीवन में माया व परिस्थित्यों की आँधी आती है तब- तब जीव के भीतर कोई सजग रहनें का एहसास जरूर करा देता है।

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