हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************

Thursday, September 11, 2008

बेचारा !

यह एक बहुत पुरानी रचना है जो कभी बचपन में लिखी थी।वही आज यहाँ लिख रहा हूँ।वास्तव में यह वह पहली रचना है जो कभी किसी छोटी-सी पत्रिका में प्रका्शित हुई थी और जिस पत्रिका में प्रकाशित हुई थी वह शायद साल दो साल बाद बंद भी हो गई थी।लेकिन फिर भी इस के प्रकाशित होनें के बाद ही मुझे कविताएं लिखने का शोक पैदा हुआ था। जो आज तक बरकरार है।


ये धरती के छंद

जिनकी गति है मंद

चलते हैं आहिस्ते-आहिस्ते

मुख में गीत गाते

गम के हो या खुशी के

बस एक पंक्ति दोहराते

अंधे विवेक का मानव

अंधियारों के डिम्ब जाल में

उतर गया है या

फँस गया

बेचारा!

12 टिप्पणियाँ:

मुकेश कुमार मिश्र said...

बहुत सुंदर........

मीत said...

khoobsurat...
orsam...
behtreen..
bahut sunder...

seema gupta said...

अंधे विवेक का मानव
अंधियारों के डिम्ब जाल में
उतर गया है या
फँस गया
" great thoughts, composed beautifully"
Regards

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

verynice post. thanks

manvinder bhimber said...

अपने बहुत ही अच्छा लिखा है ......सुंदर भाव हैं......मन को छु गये हैं

शोभा said...

बहुत अच्छा लिखा है. बधाई.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अरे वाह! बचपन हो या पचपन, एक अच्छा कवि अच्छा कवि होता ही है.

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

आहा! वाह भई वाह क्या कविता है!

जितेन्द़ भगत said...

उम्र के हि‍साब से भाव काफी गहन हैं। अच्‍छी कवि‍ता।

डॉ .अनुराग said...

वाकई बेचारा है......

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर भाव हैं, धन्यवाद

Udan Tashtari said...

बहुत सुंदर........पूत के पांव पालने में ही दिख गये थे. :)

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