हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************

Thursday, October 2, 2008

क्षणिकाएं

आज २ अक्टुबर है।बापू का जन्म दिन है।आप सब को इस कि बधाई।

बापू पर कुछ लिखना चाहता था ।लेकिन आज-कल के हालात देख कर अपनें मन में उठती पीड़ा को दबा ना सका सो कुछ ऐसा लिख दिया जो आज सभी देशवासियों को आहत कर रहा है।
यहाँ यह कहना उचित समझता हूँ कि मैं किसी के सिद्धांत गलत नहीं ठहरा रहा।यह सिद्धांत उस समय तो बहुत उपयोगी थे ,लेकिन आज इन का प्रभाव शायद ही कारगर हो सकेगा।इसी लिए कुछ ऐसी बातें लिख दी हैं....क्षमायाचना के साथ प्रस्तुत हैं कुछ क्षणिकाएं-



बापू!
तुम अकेले ना थे।
तुम्हारे कहनें पर कितनों ने
अपने को मिटाया।
लेकिन उन्हें
कौन याद करता है?
उन के चरणों में कोई
दो फूल धरता है?
शायद जीव का स्वाभाव है।
जो सामनें दिखता है
उसी को सलाम करते हैं।
उन्हें कौन याद करे
जो नींव की ईट बन मरते हैं।


बापू!
आज राजनेता
तुम्हारे नाम और सिद्धातों का सहारा ले
अपने को चमकाते हैं।
जिस देश के लिए
आपने गोली खाई।
उसी देश के देशवासीयों को
ये शांती से खाते हैं।


बापू!
आज आतंकवादीयों पर
आप का अहिंसावादी सिद्धांत नही चलेगा।
यदि इसी पर चलते रहे
वह दिनों दिन और फलेगा।
यदि आज एक गाल पर थपड़ खा कर
दुसरा गाल आगे करेगें।
तो दुसरे गाल पर भी थपड़ पड़ेगें।

17 टिप्पणियाँ:

विजय ठाकुर said...

"उन्हें कौन याद करे
जो नींव की ईट बन मरते हैं।"

सुंदर भाव संयोजन है साहब।

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुन्दर, पर्मजीत जी आप को मालुल मे कोन हे? ***"उन्हें कौन याद करे
जो नींव की ईट बन मरते हैं।"
विजय जी ने सही लिखा हे कोन याद करेगा उन्हे...वह है लाल बाह्दुर शास्त्री जी, एक सच्चे ओर सही रुप मे ईमान दार नेता, अगर आज वो जिन्दा होते तो इस देश का रुप अलग ही होना था. ओर मे प्राणाम करता हू इस नींव की ईट को.
धन्यवाद

प्रशांत मलिक said...

"उन्हें कौन याद करे
जो नींव की ईट बन मरते हैं।"

गुड

Rachna Singh said...

as usual every owrd has been written with strong passion and belief

Arvind Mishra said...

jordaar !

महाबीर सेठ said...

बाली जी ....
गांधी पर पता नहीं कितनों ने अपने विचार उड़ेले हैं । मैं कोई लेखक नहीं हूं । मन में गांधी जी को लेकर असीम पीड़ा है । उन्होंने क्या सोचा था, हम क्या कर रहे हैं । कुछ देर के लिए मैंने उनसे स्वगॆ में मुलाकात की कल्पना की, ऐसा लगा कि स्वगॆ में बैठे गांधी जी को अपने सपनों के भारत की चिंता है । यह कोरी कल्पना मेरे लिए सत्य जैसा प्रतीत हो रहा है । मैं आंखे बंद करता हूं तो बंदे मे था वंदेमातरम ही सुनाई देता है । हमें ईश्वर ने ऐसी सहनशक्ति क्यों नहीं दी है । यह सोचने की जरूरत है । मैं किसी नेता पर कमैंट नहीं करना चाहता, क्योंकि हमें पता है कि उन नेताओं को हमने ही चुना है ...
किसी को सुधारने का उपदेश देने से अच्छा है, खुद में सुधार लाओ...

dr. ashok priyaranjan said...

bapu key sidhant hamesha prasangik hain.

विनय प्रजापति 'नज़र' said...

सही बात कह रहे हैं आतंकवाद को मिटाने के लिए अमेरिका ने जो ईराक़ के साथ किया वही हमें अपने सबसे बड़े शत्रु के साथ करना होगा!

रंजन राजन said...

अच्छी रचना है आपकी ।
आज हमने बापू का हैप्पी बर्थडे मनाया। ...बापू ने कर्म को पूजा माना था, इसलिए बापू के हैप्पी बर्थडे पर देशभर में कामकाज बंद रखा गया। मुलाजिम खुश हैं क्योंकि उन्हें दफ्तर नहीं जाना पड़ा, बच्चे खुश हैं क्योंकि स्कूल बंद थे। इस देश को छुट्टियाँ आज सबसे ज्यादा खुशी देती हैं।

seema gupta said...

आज आतंकवादीयों पर
आप का अहिंसावादी सिद्धांत नही चलेगा।
यदि इसी पर चलते रहे
वह दिनों दिन और फलेगा।
यदि आज एक गाल पर थपड़ खा कर
दुसरा गाल आगे करेगें।
तो दुसरे गाल पर भी थपड़ पड़ेगें।
" mind blowing, truth thought of the day"

regards

DHAROHAR said...

Aapki pida mein ek aam aadmi ki bhavana hai.Lekin samasyaon ke hal ke liye nion to rakhni hi padegi.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

उन्हें कौन याद करे
जो नींव की ईट बन मरते हैं

बहुत सुंदर, बाली जी!

kmuskan said...

तुम्हारे कहनें पर कितनों ने
अपने को मिटाया।
लेकिन उन्हें
कौन याद करता है?

aapne sahi kaha hai .....lakin ye gandhi ji ka hi jaadu tha ki unki 1 awaaz pe sara desh unke peeche pechhe chal padta tha or kisi me kya aisa jaadu tha....nahi tha...hota to uska naam hota ....jo netartv karta hai naam to usika hota hai

ANK!T said...

नमस्कार परमजीत जी
आपने कुछ पंक्तियों में ही बीते हुए बापू के समय और आज के युग की परिश्तिथियों का जो समावेश किया है वो वाकई काबिले तारीफ है.
एक मतला है मेरा वो कहना चाहूँगा यहाँ पे,
नौजवानों में और बुजुर्गों में.
फर्क तो आ ही जाता है तजुर्बों में.

आप अपने अनुभव से मेरा भी मार्गदर्शन करे.

अंकित सफर

सचिन मिश्रा said...

Bahut accha likha hai.

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह वाह.. बंधुवर..
महत्वपूर्ण क्षणिकाएं..
सामयिक चिंतन से सराबोर...

mehek said...

तुम्हारे कहनें पर कितनों ने
अपने को मिटाया।
लेकिन उन्हें
कौन याद करता है?bahut hi sahi baat kahi,unhe koi yaad nahi karta,bahut badhiya.

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