हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************
Thursday, October 30, 2008
उम्मीद
मेरे मन में कई बार विचार आता है कि क्या हम इस जिन्दगी को जी रहे हैं.......या फिर ये जीवन हम को जी रहा है।हम सपने सजाते हैं और जीवन भर उन्हें पूरा करनें की कोशिश में लगे रहते हैं।यदि कभी कोई एक सपना सोभाग्य से कहीं पूरा हो भी जाता है तो वह अपनें साथ बीसीयों नए सपनें लेकर हमारे सामनें खड़ा हो जाता है और हम फिर उन को पूरा करनें की उधेड़्बुन में लग जाते हैं।बस सारा जीवन इसी भाग -दोड़ में चला जाता है।आखिर में जो हमारे हाथ लगता है ,वह हमे संतुष्ट नही कर पाता।हमें संतोष प्रदान नही कर पाता।हमें लगता है कि हम जो कुछ करते रहें हैं वह नाकाफी था।इतना सब कुछ होते हुए भी हम उम्मीद नहीं छोड़ते।आखिर ऐसा क्या है जो हमें सदा चलते रहनें की प्रेरणा देता रहता है।जब कि हम उसके बारे में कुछ भी तो नही जानते।कोई अज्ञात शक्ति हमें जीनें की ओर ले जाती है।या कहीं ऐसा तो नही कि हमारी यह सारी भागम भाग का कारण मौत का भय है?....
मौत दुल्हा बन इक दिन आएगा।
जिन्दगी दुल्हन को संग ले जाएगा।
मन सजाता बाँवरा सपनें यहाँ,
परमजीत इक दिन बहुत पछताएगा।
हो ना सकेगें, सपनें, तेरे सच कभी।
जानता है, बिखरेगें, सब ही यहीं।
ठहरना इसको सुहाता है कहाँ,
पड़नें लगी है इसको, कम, अब जमीं।
वक्त से पहले मगर मन मर नहीं।
इक दिन अपने,यार से मिल पाएगा।
उम्मीद दिल में ले के,ये चलते रहो,
परमजीत पहुँच इक दिन जाएगा।
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10 टिप्पणियाँ:
परमजीत जी आज पता नही मै सारा दिन यही सोच रहा था, ओर अब आप की पोस्ट मै वही बात पढ ली, भाई उमीद तो ठीक है लेकिन जब हम लालच मै फ़ंस जाते है वो गलत है, आप का ले ओर आप की कविता बहुत ही सुन्दर लगी.
धन्यवाद
लेख
बहुत खूब कहा है, व्वाह!! भाटिया जी तो यही सोच भी रहे थे, देखो!!
परमजीत जी नमस्कार,
पहले तो आपको दीवाली की ढेरो शुभकामना ,
आपका लेख और आपकी कविता बिल्कुल यथार्थ से परिचय कराती है ..
बहोत ही सुंदर और सटीक बात कही है आपने.. बधाई स्वीकार करें .
अर्श
बहुत ख़ूब...अच्छा ख़्याल है...
परमजीत जी,
जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होता है।
जब प्रकृति अपने काम से नहीं हटती, तो हम ही क्यों अपने कर्तव्य को छोड़ें। वैसे कहना आसान है। खुद मैं भी कभी-कभी ऐसा ही महसूस करने लगता हूं। खैर फिलहाल पर्वों के दिन हैं।
आपको तथा आपके परिवार को दीपोत्सव की ढ़ेरों शुभकामनाएं। सब जने सुखी, स्वस्थ, प्रसन्न रहें। यही मंगलकामना है।
उम्मीद दिल में ले के,ये चलते रहो,
परमजीत पहुँच इक दिन जाएगा।
ज़रूर, हमारी सारी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं!
सच कहा आपने भाई......मगर सबके द्वारा इस सच को समझने के बावजूद भी सब कुछ ऐसा का वैसा चलता रहता है....चलता रहेगा....!!!!
बहुत ही सुंदर कविता है
परमजीत जी बहुत बधाई
उधर डोलते राज ठाकरे
इधर हैं लालू हातिमताई
छटपूजा की बहुत बधाई
छटपूजा की बहुत बधाई
bahut hi accha laga aapko padkar...
sundar kalpna sundar ehesaas shabdon mai ho dil baat,.....
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