भूल ना पाए अब तक हम बचपन की वो यादें।
झूठ-मूठ के राजा-रानी, झूठ-मूठ के वादें।
बेमतलब दुश्मन से लड़ना,लड़-लड़ कर मर जाना।
झूठ-मूठ तेरा रोना,हँस कर, मेरा उठ जाना।
पता नही अब कब लौटेगी बचपन की वो सखियां।
झिम-झिम-झिम-झिम बरसे मेघा झिम-झिम बरसे अँखियां।
हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************
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12 टिप्पणियाँ:
बहुत सहज और सुन्दर कविता है
---मेरा पृष्ठ
गुलाबी कोंपलें
bachpan ke din......in mohak yaadon ko hum kitne jatan se rakhte hain....aapne bata diya,bahut achha laga
bahut sundar aur komal.
बढ़िया अभिव्यक्ति. आजकल कम दिख रहे हो??
Respected Baliji,
Bahut sahaj shabdon men apne bachpan kee yadon ko sanjoya hai.Badhai.
Poonam
Bali ji,
Bachpan kee yaden to sabheeke pas hotee hain,lekin unhen samhal kar ham kitna rakh pate hain ye hamaree khasiyat hogee.Achchhee kavita ke liye badhai.
Hemant Kumar
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तकनीक दृष्टा/Tech Prevue
झिम-झिम-झिम-झिम बरसे मेघा झिम-झिम बरसे अँखियाँ
कितनी सुन्दर और गेयता में अति मधुर रचना रही ये बाली जी, आपका धन्यवाद और आभार इसे पढ़वाने के लिए। बचपन कितना हसीन हुआ करता था "झूठ-मूठ तेरा रोना,हँस कर, मेरा उठ जाना”
अहा!
बहुत ही सुंदर यादें सजोई हैं आपने.......
मन प्रफुल्लित हो गया.........रचना पढ़कर
अक्षय-मन
मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
मेरे तकनीकि ब्लॉग पर आप सादर आमंत्रित हैं
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तकनीक दृष्टा/Tech Prevue
aadarniy baali ji
aapki kavita ne to hamen bachpan men pahuncha diya ..
badhai , itni sundar rachna ke liye
main bhi kuch naya likha hai ..
aapka
vijay
आपने तो भाई मुझे भी कुरेद दिया........इस अभिव्यक्ति के लिए आपको धन्यवाद..........!!
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