Saturday, January 31, 2009

बस! जागरण का इंतजार है


भीतर कुछ तो मरा हुआ है
तभी तो बाहर आँखें जो भी देखती है
भीतर कुछ सुगबुगाहट होती तो है
लेकिन फिर ना जानें क्युँ
कुछ करने से पहले ही मर जाती है।

अतंर्मन बस देखता रहता है
कुछ करता नही।
क्युँ हर बार ऐसा ही होता है
फिर अकेले में बैठ
यह मन रोता है।

पहले यह मन
दुनिया को देख कर कुछ कहता था।
अब खुद से कुछ नही कह पाता।
कुछ ऐसा खोज रहा हूँ
जो कहनें और करनें के लायक हो।
लेकिन हर बार की तरह
खाली हाथ लौट आता हूँ।
अब तो लगनें लगा है
यहाँ ऐसा कुछ भी नही है
जो कुछ होनें का एहसास
कुछ करनें का एहसास
मुझे करा सके।
यह सच है या सपना
यह जाननें के लिए रुका हुआ हूँ।
बस! जागरण का इंतजार है।

16 comments:

  1. हमें वाही पुराना गीत याद आ रहा है "वो सुबह कभी तो आएगी" . सुंदर रचना. आभार.

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  2. बहुत सुन्दर और मनोरम रचना

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  3. सुंदर रचना............बहुत खूब है
    बसंत पंचमी की बहुत बहुत बधाई

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  4. बाली साहब उम्दा लेखन है बहोत खूब लिखा है जागरण का इंतज़ार है ढेरो बधाई आपको साहब....

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  5. बहुत सुन्दर और मनोरम रचना !

    बसंत पंचमी की बहुत बहुत बधाई !

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  6. लाजवाब बाली जी...बेहतरीन....हमेशा की तरह...
    नीरज

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  7. आदरणीय बाली जी ,
    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति पूर्ण कविता ...
    बधाई .
    हेमंत कुमार

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  8. वाह बाली जी, वाह....... बेहतर कविता के लिये साधुवाद स्वीकारें..

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  9. वाह, सुन्दर रचना. बहुत खूब.

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  10. जी सर! ये दिक़्क़त हमारे यहाँ राजीव गान्धी के टाइम से ही चली आ रही है.

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  11. Respected Bali ji,
    sundar kavita..achchhe bhav..
    Poonam

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  12. हमेशा की तरह अति सुंदर.
    धन्यावाद

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  13. बस दो ही शब्द...........बहुत-१० खूब...........!!

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