
१
अब तो अपने भीतर ही
अपनी साँसों से
जख्म होनें लगे हैं।
जो सजाए थे
मैने सपने कभी
वे रोने लगे हैं।
जरा -सी हवा के
झोकों से बिखर जाएंगे।
शायद फिर कभी
लौट कर ना आएगे।
यही सोच अब
सपनो मे रंग नही भरता।
लगता है कोई सपना
अब मेरा नही मरता।
२
आज की रात
चाँद भी बहुत उदास है।
लेकिन मेरे लिए
यह रात खास है।
बादलों का छेड़ना
चाँद को नही भाता।
उस को शायद
दिल लगाना नही आता।
३
प्यास गहरी हो
ओंस भी पी जाओगे।
शिकायत अपनों से
कैसे कर पाओगे?
मेरे मन उदास तुम
कभी मत होना।
अब अकेले में बैठ
मत रोना।








17 टिप्पणियाँ:
बहुत जबरदस्त बात कह गये, बधाई!!
बहुत ही भाव भरी प्रस्तुति आपकी,
बधाई हो आपको इस सुंदर रचना के लिए..
arse baad badh padh rahaa hun magar kya khoob kalam chalaayee hai aapne .... waah bahot bahot badhaayee shahib...
arsh
अपनी ही सांस से ज़ख्म होने लगे हैं.......
बहुत ही अच्छे भाव
यूँ तीनों क्षणिकाएं ही बहुत अच्छी हैं
teno अपने अपने रंग से bahri huyee........... lajawaab rachnaayen हैं ........ mazaa aa गया
waah tino rachanaye bahut hi lajawab hai,khas kar chandwali bahut pasand aayi.
bahut hi shandar abhivyakti hai........har kshnika lajawaab
आदरणीय बाली जी ,
आपकी तीनों ही रचनाएँ सुन्दर भावों को संजोये हैं ...बधाई .
पूनम
सीधे दिल में उतर जाने वाली रचनाएँ
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श्री युक्तेश्वर गिरि के चार युग
सरल और सुन्दर रचनायें जी।
धन्यवाद।
मेरे मन उदास तुम
कभी मत होना।
अब अकेले में बैठ
मत रोना।
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आपने तो यह निदान बता दिया उदासी का मित्र।
baali jee ek baar nahin baar baar padha hai teeno ko bahut khoobsurat kashanikayen hain badhaai
आदरणीय बाली जी ,
आपकी तीनों ही कवितायेँ बहुत अच्छी लगीं ....कम शब्दों के बावजूद एक अलग प्रभाव डालने वाली.
हेमंत कुमार
सपनो में रंग नहीं भरता
खूब कल्पना है उदासी भरी लेकिन आज के माहौल मे सच
Hi,
Thank You Very Much for sharing this informative and also effective article here with us...
Somnath | Junagadh District | Gir National Park
बहुत ही शानदार प्रस्तुति , तीनो क्षणिकाये बहुत ही सुन्दर ,
बधाई आपको
सादर
राकेश
... प्रसंशनीय रचनाएँ, बधाईंयाँ !!!
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