हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************

Thursday, September 10, 2009

वक्त से आगे वक्त से पीछे


बहुत भागा ......
वक्त के साथ हो लूँ।
लेकिन
हमेशा पीछे छूट जाता हूँ।
वक्त से हारने पर,
अपने को सताता हूँ।
लेकिन
अब मैने वक्त के पीछे दोड़ना
छोड़ दिया है।
उस से मुँह मोड़ लिया है।
अब वक्त पर
बिछोना बिछा कर
उस पर लेट गया हूँ।
वक्त जहां चाहता है ,
मुझे ले जाता है।
अब मुझे वक्त नही सताता है।

23 टिप्पणियाँ:

विनय ‘नज़र’ said...

great efforts, good words...

Udan Tashtari said...

क्या बात है..बहुत उम्दा!!

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति !!

•๋:A∂itya™© said...

AB MUJHE WAQT NAHI SATATA HAI..

wah!

bahut sundar baali sahab ...

Nitish Raj said...

अब मैंने वक्त के पीछे दोड़ना छोड़ दिया है,
उससे मुंह मोड़ लिया है।
बहुत बढ़िया परमजीत भाई, बहुत खूब।

दिगम्बर नासवा said...

SACH KAHA ..... VAQT KI PEECHE BHAAGNE SE KUCH NAHI HAANSIL HOTA .... SANAY KE SAATH SAATH, USKE BAHAAV MEIN BAHNAA HI JEEVAN KI SAARTHAKTA HAI ,........ SUNDAR KAVITA HAI

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

वक्त को आगे से पकड़ो मित्र! दास बन जायेगा!

रश्मि प्रभा... said...

बहुत ही अच्छी रचना है......

राज भाटिय़ा said...

वहुत सुंदर रचना,आप का धन्यवाद

चंदन कुमार झा said...

बहुत सुन्दर !!!!!!!!1

vandana said...

waah waah...........lajawaab.
waqt ko kar mutthi mein
jisko jeena aa gaya
samjho wo hi zindagi ko
paa gaya

behad dil ko choone wali rachna.

read my new blog--http://ekprayas-vandana.blogspot.com

Nirmla Kapila said...

बहुत बडिया रचना है वक्त के बिछैने पर तो बैठना ही पडता है कितना भी भाग लो इस से आगे नहीं निकल सकते शुभकामनायें

Harsh said...

bahut sundar

सर्वत एम० said...

कमाल कर दिया बाली.....नहीं...बल्ले बल्ले. यार, बहुत दमदार रचना है. मन नाच उठा. इतनी जबर्दस्त मनोवैज्ञानिक कविता है की तारीफ के लिए शब्द नहीं मिल रहे हैं. मुझे लगता है यह आपसे हुई नहीं, आप पर उतरी है.

महफूज़ अली said...

waqt ke upar aapne bahut achcha likha hai.......

पी.सी.गोदियाल said...

अब मुझे वक्त नहीं सताता है,
बहुत सुन्दर !

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...
मैनें अपने सभी ब्लागों जैसे ‘मेरी ग़ज़ल’,‘मेरे गीत’ और ‘रोमांटिक रचनाएं’ को एक ही ब्लाग "मेरी ग़ज़लें,मेरे गीत/प्रसन्नवदन चतुर्वेदी"में पिरो दिया है।
आप का स्वागत है...

Mumukshh Ki Rachanain said...

कितना सहज हो गया सब कुछ.

बहुत अच्छे.

चन्द्र मोहन गुप्त
जयपुर
www.cmgupta.blogspot.com

creativekona said...

Bali ji,
bahut hee sundar aur arthapoorna kavita hai apakee.badhai sveekaren.
HemantKumar

JHAROKHA said...

बहुत ही सुन्दर सरल और सहज शब्दों में लिखी गयी कविता----
पूनम

avinaash said...

barhi mushkil se tippani ka column mila to hindi bhasha ka tool nahi mila. Kavit itni sunder hai ki Hindi pakhwada jo jagah jagah nazar aata hai , main shaamil hote to yakinan pratham puruskar milta. Abhi to sarvotam kavita ki badhayee sweekar kijie.

दर्पण साह "दर्शन" said...

wah wah !!
nishabd kar diya aapki rachna ne...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत सुन्दर!

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