Saturday, June 4, 2011

उम्मीद....


बीती बातों का फिर .... सिलसिला चला।
करें शिकायतें किससे जब अपनों ने हो छला।

उधार खुशीयां ले कर जीये तो क्या जीये।
कसक दिलको तड़पाती रही.खुद को यूँ छला। 

हरिक आदमी देखता है ...दूजों का चहरा।
नजर बचाता है खुद से...बचा है कौन भला।

मुझे उम्मीद थी मैं भी जानूँगा एक दिन।
उम्मीद का क्यूँ इतनी देर सिलसिला चला।

4 comments:

  1. बहुत ही अच्छा पोस्ट है जी !मेरे ब्लॉग पर आए ! आपका दिन शुब हो !
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  2. उम्मीद का क्यूं इतने दिन सिलसिला चला........
    क्योंकि शायद उसी पर दुनिया कायम है।
    सुंदर अभिव्यक्ति।

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