Thursday, July 7, 2011

तन्हाई.....



ना जानें क्यूँ ये तन्हाई मुझे भानें लगी।
तेरी यादों की परियां गीत फिर गाने लगी।

यहाँ कोई भी मेरे साथ हसँता है ना रोता है,
यही इक सोच मुझको फिर  तड़पाने लगी।

कभी पंछी-सा मन उड़ता था  आकाश में,
बस !यही बात मुझको फिर सताने लगी।

जहाँ भी देखता हूँ अब मुझे पतझड़ लगे,
बहारें भी मुझसे मुँह फैर ,   जाने लगी।

ना होती याद तो किसके सहारे जी रहा होता,
तन्हाई मुझे ये राज फिर समझाने लगी।

ना जानें क्यूँ ये तन्हाई मुझे भानें लगी।
तेरी यादों की परियां गीत फिर गाने लगी।

12 comments:

  1. यहां कोई भी मेरे साथ हंसता है ना रोता है,
    यही इक सोच मुझको फिर तड़फ़ाने लगी।
    बहुत ख़ूब।

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  2. यादों की परियाँ, यूँ ही गीत गाती रहें,
    तड़पा तो गयी हैं और तड़पाती रहें।

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  3. aisee kya khasiyat hai tanhai me:)
    bahut khubsurat rachna...

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  4. बहुत सुन्दर भाव भरी गज़ल्।

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  5. बहुत ही सुन्‍दर भावमय करते शब्‍द ।

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  6. प्रिय ब्लोग्गर मित्रो
    प्रणाम,
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  7. सुन्दर रचना, सुन्दर भावाभिव्यक्ति , आभार

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  8. बाली जी बहुत दिनों के बाद आपके ब्लॉग पर आई हूँ ।
    और एक अलग सा अंदाज़ देखने को मिला है । तनहाई भी कभी कभी रास आ ही जाती है ।

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