Friday, October 5, 2012

मुक्तक माला - १०



उसका पता मालूम है 
फिर भी भटकता रहता हूँ।
नदी नालों में जल धार-सा, 
ना जानें बन क्यूँ बहता हूँ ?
ये तलाश जन्मों जन्म से 
हर शख्स देखो कर रहा ,
खुद से ही हो कर बेखबर ,
ये विरह कैसा सहता हूँ ?

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विरह की आग हर हाल में जलायेगी,
कुछ तो ऐसा है जो खाली रहता है।
दुनिया की सारी खुशीयां चाहे बटोर लो,
दिल का इक कोना दर्द सहता है।
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हरिक दर्द की दवा नही होती ।
हरिक आँख विरह में नही रोती ।
हर तरह  के लोग हैं जमाने में,
पत्थरों की मूरतें कहाँ नही होती।

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12 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (06-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. ढूढ़ रहा हूँ, ढूढ़ रहा था,
    याद अभी भी, यहीं मिला था।

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  3. बहुत खूब ,बहुत खूब..
    बहुत बढ़िया ...
    :-)

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  4. बेहतरीन मुक्तक.

    बहुत सुंदर प्रस्तुति.

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  5. हर तरह के लोग हैं जमाने में,
    पत्थरों की मूरतें कहाँ नही होती।...........सुंदर प्रस्तुति.

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  6. हर तरह के लोग हैं जमाने में । सही कहा ।
    बहुत भावप्रवण प्रस्तुति ।

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  7. सच कहा आपने हमारा जीवन एक अनंत व अतृप्त तलास ही तो है. सुंदर प्रस्तुति।

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