Tuesday, December 11, 2012

पहचान




वक्त गुजर जाता है और सोचते रहते हैं हम।
जिन्दगी मे खुशी और पाये हैं, कितने गम।
कौन है दोस्त और दुश्मन हमारा कौन यहाँ-
रोते आए थे ,क्या  रोते हुए ही जायेगें हम।

देख दुनिया का तमाशा तुझे करना क्या है।
एक दिन मरना है तो मौत से डरना क्या है।
अपने को पहचान ले,गर सच में जीना है-
बेहोशी में गर जी लिये तो,ये जीना क्या है।

प्रेम के बदले जो, प्रेम की   चाह करता है।
अपना बन के वही दोस्त छला करता है।
प्रेमी प्रेम के बदले , कुछ चाहता ही नही-
उसी की खातिर  जीता है और मरता है।




10 comments:

  1. स्वयं को पहचानना ही ध्येय हो।

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  2. जीवन में रोजमर्रा की उठापटक का सुंदर लेखाजोखा समाहित है इस सुंदर कविता में.

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  3. खुद को पहचान लिया तो सब कुछ पा लिया ...
    लाजवाब रचना ...

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  4. बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्त लिया है आपने मनोभावों को. आभार.भारत पाक एकीकरण -नहीं कभी नहीं

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  5. प्रेमी प्रेम के बदले कुछ चाहता ही नहीं
    उसी की खातिर जिन्दा है और मरता है.

    बहुत उम्दा भाव. सुंदर प्रस्तुति.

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  6. सच्चे प्रेम में स्वार्थ की कोई जगह नही । वह तो सिर्फ देना जानता है ।

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