दूर कहीं आसमान से
मुझे वह जहाँ भी मिले
मुझे भाता।
मैं भी तेरा
बेटा ही हूँ।
हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************
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3 टिप्पणियाँ:
उस दिन जब तुमआसमान में बैठे
कुछ गा रहे थेअपनी ही मस्ती में गुम
अपनें को ही अपना गीतसुना रहे थे।
मैनें तुम्हारे शब्दों को
टूट कर धरती पर बिखरते देखा।वह जहाँ भी गिरे
फूल बन-बन के खिले।एक अजीब सी महक
उन से आ रही थीजिसने मुझे ना मालूम कब
अपनी ओर खींचा।अपने मोहपाश में भींचा।
bahut sundar panktiyan
जब भी कोई गीत गाता हैसुन लेता हूँ ,
क्यूँकि जान चुका हूँइन सब की तरह ,
मैं भी तेरा
बेटा ही हूँ।
aur sundar antimsatya,main bhi tera beta hun,bahut khubsurat
वाह!! बहुत खूब..भावपूर्ण अभिव्यक्ति.
इस लिए मैं अब
पीर,पैगंबरों के सजाए गीत
नही गाता।
बस!अब यही है
मुझे भाता।
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जिन कागजों पर लिखे शब्दों से
बहकता है ज़माना
हम उन्हें नहीं पढ़ पायेंगे
अपनी जिन्दगी अपने ही शब्दों से सजायेंगे
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दीपक भारतदीप
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