हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************

Friday, March 14, 2008

गजल



मुस्कराता-सा हरिक चेहरा यहाँ लगता है।
चहरे पर चेहरा यह, बहुत खूब फबता है।

हम रोज तेरी महफिल में आते थे मगर,
जिक्र हमारा हुआ हो कभी,नही लगता है।

जाम हर बार तुम्हीं थमाते थे, हाथों में,
कहीं मोहब्बत थी ये तुम्हारी, क्यूँ लगता है।

मुस्कराता-सा हरिक चहरा यहाँ लगता है।
चहरे पर चहरा यह, बहुत खूब फबता है।

दर्द दिल में छुपाए यूँ ही हम तो जीए जाएंगें,
इस जमानें का है दस्तूर यही ,क्यूँ लगता है।

नही ऐसा मिला कोई, जो कहे तुम्हारा है,
हरिक शख्स यहाँ अपनें लिए, जीता मरता है।

4 टिप्पणियाँ:

रजनी भार्गव said...

बहुत अच्छा लगा ये शेर,

मुस्कराता-सा हरिक चहरा यहाँ लगता है।
चहरे पर चहरा यह, बहुत खूब फबता है।

mehek said...

दर्द दिल में छुपाए यूँ ही हम तो जीए जाएंगें,
इस जमानें का है दस्तूर यही ,क्यूँ लगता है।
bahut khub

दीपक भारतदीप said...

मुस्कराता-सा हरिक चेहरा यहाँ लगता है।
चहरे पर चेहरा यह, बहुत खूब फबता है।
----------------------------
दिल को छू लेने वालीं पंक्तियाँ
दीपक भारतदीप

tarun said...

हम रोज तेरी महफिल में आते थे मगर,
जिक्र हमारा हुआ हो कभी,नही लगता है।

bahut hi achhi ghazal hai ..

-tarun

Post a Comment

आप द्वारा की गई टिप्पणीयां आप के ब्लोग पर पहुँचनें में मदद करती हैं और आप के द्वारा की गई टिप्पणी मेरा मार्गदर्शन करती है।अत: अपनी प्रतिक्रिया अवश्य टिप्पणी के रूप में दें।