हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************

Sunday, February 1, 2009

माँ का नया रूप

माँ की परिभाषा
अब बदलने लगी है
अब माँ घर में रह कर
बच्चो को लोरी नही सुनाती ।
अब चार दिवारी
उसे नही सुहाती।

अब वह भी बाहर जा कर
कुछ कमाना चाहती है।
इस लिए बच्चो की जिम्मेदारी
आया को सौंप जाती है।

अब मुन्नु को माँ का चहरा
रात मे ही दिखता है।
अब वह सब कुछ
आया से ही सीखता है।

अब माँ पहले से भी ज्यादा
थकी-हारी आती है।
आते ही पंलग पर सुस्ताती है।
थकान मिटा कर बहुत कम बतियाती है।
फिर रात के खानें मे जुट जाती है।
मुन्नु टुकुर-टुकुर अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से
माँ को घर में इधर-उधर दोड़ते तकता रहता है।
अपनी भाषा में बहुत कुछ कहता है।
लेकिन माँ-बाप की व्यस्तता,
कोई कुछ नही कहता है।

मुन्नु जानता है
माँ सदियों बाद अभी-अभी जागी है
अब माँ को नये रूप में
देखने की आदत डालनी होगी।
अब संतानें माँ को ही नही
पुरूष को भी पालनी होगी।

प्यारे मुन्नु!!!
अब माँ का यह नया रूप स्वीकारो!
जरूरत पड़ने पर ही माँ को पुकारो।
जरूरत पड़ने पर ही माँ को पुकारो।

18 टिप्पणियाँ:

PN Subramanian said...

सुंदर कटाक्ष. यही तो है वो नई दिशाएं.आभार

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सच बात है!

Nirmla Kapila said...

aaj ke yatharath ko shabdon me achha baandha hai

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

बात तो आपने सच्ची-कडुई मगर गहन कह दी भई.........इस पर विचार प्रकट करना भी विवादों को जन्म देना होगा.........!!

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

हकीकत ब्यान की आपने . क्रेच मे पलने वाले मुन्ने माँ क्या होती है या कहे थी महसूस करेंगे

विष्णु बैरागी said...

बात कडवी है किन्‍तु सच है। जो व्‍यवस्‍थाएं हमने स्‍वीकार कर ली हैं उनमें अब मुन्‍नू को टुकुर-टुकर ही देखते रहना है।

"अर्श" said...

मन्नू की ब्यथा की कहानी आपके लेखनी की जुबानी,, बहोत ही बढ़िया भाव डाला है आपने बहोत खूब ... जरुरत पड़ने पर ही माँ को पुकारो... वाकई खूब कही आपने .. बधाई ....
अर्श

mehek said...

aaj ka sach sahi bayan kiya hai,aur shayad iski jarurat waqt ke saath hai bhi,bahut sundar tarike se samjhaya hai munnu ko.magar hum jab chote thay hamesha lagta ke maa ghar pe ho jab hum school se aaye,magar aisa kabhi nahi hua,shayad doctor ke santaan hone ka khamiyaja bugat rahe thay hum.hum issi vichar ke hai ke jab tak baalak 2 ya 3 saal na ho maa ko uske aath rehna chahiye.ek aaya wo sanskaar nahi de sakti jo maa ya pita de sakte hai.ye baat jarur hai santaan ke paalan mein pita ka dayitva badhna chahiye,magar aaj bh hum kahenge maa se bachha jitna juda hota hai utanaa pita se nahi atleast prathamik daur mein,kyunki apna dhudh pilate waqt jo bhavwna maa aur shishu mein bandh jati hai wo ek pita sntaan mein nahi panappati.atleast ek shishu maa ki god mein sakn mehsus karta hai.shayad koi hamare baat se sehmat na ho.magar yahi sach hai.

Yogesh said...

sach likhaa hai....

yahi hai to hai aaj ki sachhaaiii...

Pratap said...

यथार्थ को बहुत सुन्दरता से शब्दों में ढाला है आपने....पढ़कर मन में कुछ उठा ---
जीवन संघर्ष में चीजों का रूप बदलता है
पर जो है मूल सदा वह चलता है
मुन्नू को लोरियां न सुना पाने का दर्द
आज माँ की आंखों में पलता है

रंजना [रंजू भाटिया] said...

यही आज की माँ का सच है ..सुंदर लगी आपकी यह कविता

Rachna Singh said...

माँ जो काम पर जाती हैं
संतान उसकी ही ज्यादा आत्मविश्वासी बनती हैं
माँ के काम पर जाने से
बच्चे का विकास ज्यादा बढ़िया होता हैं
मेरी माँ ने ४२ साल जिंदगी के नौकरी की और मुझे खुशी हैं की मुझे ऐसी माँ मिली जिसके पास सास बहु की खित पिट , नन्द भाभी के झगडे और पास पडोस की औरतो की पंचयात के लिये समय का हमेशा अभाव रहा . माँ जितनी सशक्त होगी बच्चे उतने ही मजबूत होगी . बचपन माँ का अभाव उतना नहीं समझता जितना बड़े होने पर सुविधा का न मिलना अखरता हैं . काम काजी माँ ये निश्चित कर सकती हैं की उसके बेटे और बेटी का भविष्य सुरक्षित हो . काम काजी माँ किसी पर आश्रित नहीं होती इसलिये उसके बच्चे बहुत जल्दी सवाबलम्बी हो जाते हैं

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत सही कहा आपने माँ को जरूरत पडने पर ही पुकारो न हो तो बाप को ही पुकारो वह भी सीख गया है दुदु पिलाना नैपी बदलना ।

रश्मि प्रभा said...

anyaay ke virodh me bachchon ka sahi vikaas,nishchhal sapne chhin gaye.......maa dusre ulaahano ke pinjde me kaid ho gai.......

संगीता पुरी said...

आज की मां को यह सोंचना चाहिए कि एक बच्‍चे को जो संस्‍कार देना आवष्‍यक है , वह आया नहीं , वह ही दे सकती है......इसलिए अपनी महत्‍वाकांक्षा को छोडकर बच्‍चे के लालन पालन पर ध्‍यान देना चाहिए।

परमजीत बाली said...

PN Subramanian, Smart Indian - स्मार्ट इंडियन,Nirmla Kapila, bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) ,dhiru singh {धीरू सिंह} ,विष्णु बैरागी ,"अर्श" ,mehek ,Yogesh ,Pratap,रंजना [रंजू भाटिया] ,Rachna Singh ,Mrs. Asha Joglekar ,रश्मि प्रभा तथा संगीता पुरी आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद।

Jasmeet.S.Bali said...

very good poem you have wrriten-


अब वह भी बाहर जा कर
कुछ कमाना चाहती है।
इस लिए बच्चो की जिम्मेदारी
आया को सौंप जाती है।

parashar said...

आधुनिक नारी के पास मा के रुप मे समय का अभाव दर्शाते हुए बहुत सुन्दर कहा है:-

"प्यारे मुन्नु!!!
अब माँ का यह नया रूप स्वीकारो!
जरूरत पड़ने पर ही माँ को पुकारो।"

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