हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************

Thursday, April 16, 2009

मत पूछिए..............


मत पूछिए क्या सोच घर से निकल पड़ा।
हरिक कदम पे मुझको, पत्थर मिला पड़ा।

छोड़ा था घर जिस के लिए, उसे ढूंढते रहे,
वो घर अपनें बैठा रहा, जिद पे रहा अड़ा।

क्यों मान दिल की बात दिल लगा बैठे,
तड़पना तमाशा बना , वो हँसता रहा खड़ा।

अब आखिरी साँसों में, जाना तेरा वजूद,
परमजीत अपनें भीतर कब से था पड़ा।

28 टिप्पणियाँ:

श्यामल सुमन said...

जीवन है जंग ऐसा पत्थर पड़े मिलेंगे।
होते सफल है जिसमें हो हौंसला बड़ा।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

mehek said...

क्यों मान दिल की बात दिल लगा बैठे,
तड़पना तमाशा बना , वो हँसता रहा खड़ा।

अब आखिरी साँसों में, जाना तेरा वजूद,
परमजीत अपनें भीतर कब से था पड़ा।
gehre bhav kuch dil ke kareeb,bahut khub

prabhat gopal said...

acha raha

RAJIV MAHESHWARI said...

सच के बहुत करीब ...
सुंदर ......

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सच के करीब सुन्दर लगा हर शेर

विनय said...

बहुत दिन बाद आपको पढ़कर काफ़ी अच्छा लगा

Anil Pusadkar said...

हर शेर लाजवाब्।

vandana said...

aatma ka sundar roop prastut kiya aapne.............satya to yahi hai magar hum use hi nhi khojte.

creativekona said...

vah bahut badhiya gajal....Bali ji..
apko hardik badhai.
HemantKumar

दिगम्बर नासवा said...

लाजवाब रचना है .............हर शेर खूबसूरत है

अनिल कान्त : said...

लाजवाब ...

hem pandey said...

एक और सुन्दर रचना के लिए साधुवाद.

shyam kori 'uday' said...

... प्रभावशाली अभिव्यक्ति !!!!!!!

Meynur said...

Sabhi aashar bade ache hai...!

संजय तिवारी ’संजू’ said...
This post has been removed by the author.
संजय तिवारी ’संजू’ said...

लाजवाब रचना अब आखरी सासों मे जाना तेरा बजूद आखिर ढूंड ही लिया

डॉ. मनोज मिश्र said...

खूबसूरत रचना .

P.N. Subramanian said...

सुन्दर रचना. पत्थरों को हटाते चलें ताकि दूसरा न गिर पड़े.

neha said...

bahut badiya.....

चंदन कुमार झा said...

सुन्दर रचना .शुभकामनायें.

Harkirat Haqeer said...

मत पूछिये क्या सोच घर से निकल पड़ा
हरेक कदम पे मुझको पत्थर मिला पड़ा

वाह वाह...बलि जी तुसीं ते कमाल कर दित्ता....!!

अब आखिरी सांसों में जाना तेरा वजूद
परमजीत अपने भीतर कबसे था पडा

अब जब आपने जान ही लिया है तो हमें और अच्छी अच्छी गज़लें पढने को मिलेंगी उम्मीद है .....!!

Nirmla Kapila said...

बालीजी बहुत सुन्दर अभिव्यक्ती है शु्भका् मनायें

विनोद कुमार पांडेय said...

बहुत सही परमजीत जी सुंदर रचना...बधाई हो !

पत्थर मिला फिर भी दीवानगी तो देखिए,
आख़िरी साँसों तक तेरी याद संभाले रखा.

तमाशा बना तुझे, रिझाता रहा हर पल,
तेरी हँसी का ख्वाब, अपने दिल मे पाले रखा.

Udan Tashtari said...

वाह भई!! बहुत उम्दा रचना!! आनन्द आया/

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

सुन्दर भावपूर्ण रचना....बधाई

गर्दूं-गाफिल said...

सुंदर अभिव्यक्ति के लिए बधाई

Babli said...

पहले तो मै आपका तहे दिल से शुक्रियादा करना चाहती हू कि आपको मेरी शायरी पसन्द आयी !
बहुत ही खुबसूरत लिखा है आपने ! आप एक बहुत ही अच्छे कलाकार है !

Prem Farrukhabadi said...

paramjit ji ,
sundar rachna ke liye badhaai.

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