Tuesday, December 18, 2007

एक सवाल....

हर रात
नया सपना
जन्म लेता है।
हर सुबह
वह अपना दम तोड़ देता है ।
अंधेरे और रोशनी की
इस लड़ाई में,
कौन जीता
यह दिखाई नही देता है।

फिर भी छूटता नही,
सपने बुनने का चलन।
एक की जगह
दूसरा ले लेता है।
बस बुनते रहो और टूटते हुए देखो,
जीवन क्या यही,
बस हमें देता है?

6 comments:

  1. बाली जी बहुत गहरी बात कही आपने. इस कविता का दर्शन हम मे से बहुतों के जीवन पर भी लागू होता है. पर मन फ़िर भी एक ही बात कहता है.
    " वो सुबह कभी तो आयगी
    जब पूरे होंगे सपन हमारे."

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  2. सपने

    सपने
    पूरे हो जायें तो अपने
    नहीं तो सपने

    http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/2006/10/sapanay.html

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  3. सच बात कही आपने. बहुत सुंदर शब्द और उतने ही सुंदर भाव.
    वाह..वा ...
    नीरज

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  4. लयबद्ध काव्य।

    यदि कविता कवि का अपना मर्म है तो मर्म का हल बहुत आसान है।

    संजय गुलाटी मुसाफिर

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  5. sapno ko sahi sakar kiya hai,ek gaya tho duja janam leta hai,bahut badhiya.

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