Thursday, December 20, 2007

आज का सच

मरनें दो उसे!!!
जी कर भी क्या करेगा?
अपने को साबित करना
वह कब का भूल चुका।
सफेद कफन ओड़े
संवेदनाओं से हीन है,
संज्ञा से हीन है,
वह बहुत दीन है।

पतझड है चारों ओर
कहता बसंत छाया।
पंछी बिन पंख उड़ता
कहता आकाश पाया।
ना मालूम किस दुनिया में
बैठा है सपनें बुनता
सपनों को बुननें में
कितना तल्लीन है।
वह बहुत दीन है।

जिन्दा है रहना मुश्किल
चलना भी दूभर हुआ
कदम-कदम गिरता है
घायल है लहूलुहान हुआ
देखा -सुना सबनें
बजती जैसे भैसों के आगे
वही पुरानी बीन है।
वह बहुत दीन है।

6 comments:

  1. भाई बहुत सुंदर...ये आज का सच नहीं..कडुआ सच है...बेहतरीन रचना. वाह...
    नीरज

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  2. कटु और नग्न सत्य.
    कविता के माध्यम से अच्छा बयां किया आपने.

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  3. वाह ! बहुत सुंदर ..अच्छी लगी आपकी यह कविता

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  4. अच्छा है सर. अच्छी नज़र डाली है सच पर. क्या करें ? कमबख्ती के मारे हैं, यही सच है.

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  5. जीवंत रचनाएँ लिखने वाला, आज कहाँ खो गया।

    रचना बहुत ही अर्थपूर्ण और लयबद्ध है।

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  6. जीवन के कटु सत्य को उजागर करती सुंदर रचना के लिए धन्यवाद,बाली जी.

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