हम से होकर अनंत दिशाएं चारों ओर जाती हैं....लेकिन सभी दिशाएं वापिस लौटनें पर हम में ही सिमट जाती हैं...हम सभी को अपनी-अपनी दिशा की तलाश है..आओ मिलकर अपनी दिशा खोजें। ************************************************************************************************************************************ ************************************************************************************************************************************

Tuesday, December 30, 2008

कैसे वादे हैं तेरे


कैसी कसमें हैं तेरी, कैसे वादे हैं तेरे,
हर सहर खाते हो, शबमें, भूल जाते हो।
इससे अच्छा था , कोई वादा ना करते हमसे,
बेवजह रोज, शर्मिंदगी, उठाते हो।
जानते हैं, तुम्हारे दिलमें कोई, गैर रहता है,
नामालूम कैसे, दोनों से, निभाते हो।
भूलना चाहा बहुत, भूल ना पाया कोई,
दिल के हाथों, मजबूर,जब हो जाते हो।
अजीब बात है, हर दिल की ,यही कहानी है,
परमजीत हँसेगें गैर,आँसू जो बहाते हो।

कैसी कसमें हैं तेरी, कैसे वादे हैं तेरे,
हर सहर खाते हो, शबमें, भूल जाते हो।

13 टिप्पणियाँ:

विनय said...

क्या करें नियम की तरह, वादे भी तोड़ने की चीज़ हैं खाकर पेट थोड़े ही भरता है। अरे मज़ाक कर रहा था, कहाँ रहते हैं आज कल जनाब ईद के चाँद हो गये हैं। इस काव्य में मनोभाव का सुन्दर प्रस्तुतिकरण रहा!

Nirmla Kapila said...

छोडिये जनाब आगे बडिये---उनकी जफा पे अपनी वफा कहती है खुदगर्ज चेहरों पे अब नकाब रहने दो

"अर्श" said...

कैसे है जनाब ? काफी दिनों के बाद !बहोत ही सुंदर भावों से प्रस्तुति बेहद खुबसूरत ...ढेरो बधाई बाली साहब...

अर्श

seema gupta said...

कैसी कसमें हैं तेरी, कैसे वादे हैं तेरे,
हर सहर खाते हो, शबमें, भूल जाते हो।

"कसमें और वादे होते ही बेफवा है, बस उठाए जाते हैं निभाए कहाँ जाते हैं, सुंदर अभिव्यक्ति "

Regards

mehek said...

इससे अच्छा था , कोई वादा ना करते हमसे,
बेवजह रोज, शर्मिंदगी, उठाते हो।
waah bahut hi badhiya,shayad ishq mein kasam todne ke liye khateho.

नीरज गोस्वामी said...

बाली जी आप लिखते बहुत कम हैं लेकिन जब लिखते हैं कमाल करते हैं...आप की ये रचना भी दिल से लिखी गई है और सच्ची बात कहती है...बहुत खूब भाई बहुत खूब....
नीरज

Vijay Kumar Sappatti said...

bahut sundar bali ji ,

जानते हैं, तुम्हारे दिलमें कोई, गैर रहता है,
नामालूम कैसे, दोनों से, निभाते हो।

kya likha hai , dil ke bheetar jaati hui lines hai ..

कैसी कसमें हैं तेरी, कैसे वादे हैं तेरे,
हर सहर खाते हो, शबमें, भूल जाते हो।

wah wah , bahut sundar sir ji ..
bahut badhai ..

main bhi kuch naya likha hai , aapka sneh chahiye ..

aapka vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/

रश्मि प्रभा said...

bahut hi achha likhte hain aap.......main to aapki prashansak ho gai hun

राज भाटिय़ा said...

वाह क्या लिखा है, आप की कविता पढ कर मुझे एक गीत याद आ गया.... कस्मे वादे प्यार वफ़ा सब बाते है बातो का कया?..... बाली साहब आप के शेर गजले, ओर कविताये सीधी दिल मे उतरती है.
धन्यवाद

Alag sa said...

परमजीत जी,
आने वाला वर्ष आप और आपके परिवार के लिये ढेर सारी खुशियां ले कर आए।

Yogesh said...

bahut achha likhaa hai paramjit ji..

कैसी कसमें हैं तेरी, कैसे वादे हैं तेरे,
हर सहर खाते हो, शबमें, भूल जाते हो।

gazab ki lines hain ye...

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाह्! बहुत खूब. बहुत ही अच्छी रचना
आपको एवं आपके समस्त मित्र/अमित्र इत्यादी सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाऎं.
ईश्वर से कामना करता हूं कि इस नूतन वर्ष में आप सबके जीवन में खुशियों का संचार हो ओर सब लोग एक सुदृड राष्ट्र एवं समाज के निर्माण मे अपनी महती भूमिका का भली भांती निर्वहण कर सकें.

MUFLIS said...

bhoolna chaha bahot, bhool n paya koi, dil ke haatho majboor jb ho jate ho....
kisi ki bewfaae pr ranj ka izhaar agr zroori hai to, shikayat ka ikhtiyaar bhi laazim hai...
bahot achhi rachnaa hai...
badhaaee svukaareiN !!
---MUFLIS---

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