Saturday, May 5, 2007

यही है.....

यही है मितवा जीवन की धारा
राही अकेला ना कोई किनारा ।

बहारों के मौसम में ढूंढेगें उनको
बिछ्ड़ा हुआ क्या मिलेगा दुबारा ।
यही है मितवा जीवन की धारा
राही अकेला ना कोई किनारा ।

हरिक मोड़ पर एक चौराह मिलेगा
जाऊँ कहाँ तू समझ ना सकेगा
बहनें दे किस्ती को रूख पे हवा के
जतन से तेरे ना मिलेगा किनारा।

यही है मितवा जीवन की धारा
राही अकेला ना कोई किनारा ।

हरिक राह पर बहारें ना होगीं
हरिक चाह किसने यहाँ कभी भोगी
मासूम आँखें हँसेगी रोएगीं
तब ढूढंता तू फिरेगा सहारा।

यही है मितवा जीवन की धारा
राही अकेला ना कोई किनारा ।

गाता, हसँता था जो संग तुम्हारे
अपनी जां से कहता था प्यारे
तोड़ेगा विश्वास अभी संम्भल जा
किसी दिन करेगा तुझ से किनारा।

यही है मितवा जीवन की धारा
राही अकेला ना कोई किनारा ।

3 comments:

  1. परमजीत जी ये तो सच है कि अकेले आये है और अकेले ही जाना भी होगा,..मगर फ़िर भी ये जिन्दगी कब बार-बार मिलती है,मुरछा के कली कब खिलती है,..निराश मत होईये । भावपूर्ण,सवेदन्शील कविता है,...
    सुनीता(शानू)

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  2. परमजीत भाई,
    आपका हिन्दी ब्लागकारी में स्वागत है।

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  3. अच्छी कविता लिखी है आपने ।
    घुघूती बासूती

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