Tuesday, May 22, 2007

मुक्तक-माला-२

१.

मेरे चमन मे ये किसने लगा दी आग ।
पहली चिगांरीयां अभी बनी थी खाक ।
ओ,चमन के रहनुमाओं क्यूँ मौन बैठे हो,
जल जाएगा गुलिस्तां टूटेगें सभी ख्वाब।

२.

क्या ये है जिन्दगी, राह फूल खारों की।
बनते बिगड़ते कारवाँ, ओ-बहारों की।
खेलती है कश्ती मोहब्बत मे तूफां से,
उम्मीद बनी रहती जहाँ किनारो की।

बुरी नही है यह, जो काली रात आई है ।
देखों तो, सितारों की मोहक बारात लाई है ।
बड़ी ही शांत है यह तो जरा चिन्ता संगमें है,
सुबह होती है कब कैसे,यही एहसास लाई है।

6 comments:

  1. दूसरा ज्यादा सटीक है, बहुत अच्छा, बधाई.

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  2. बहुत सुन्दर!
    घुघूती बासूती

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  3. सुन्दर मुक्तक, बधाई!!

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  4. सुन्दर लिखा है बाली भाई... बाल की खाल निकालेंगे तो हर मुक्तक से एक सुन्दर कविता निकल आयेगी....

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  5. aapko aaj pahli baar padhne ka awasar mila aur aapki ye panktiyan ki abhi chaman chingari se khak bana diya achha laga.

    aapko aage bhi padhne ka awsar milta rahega yahi umeed hai

    khyaal rakhe apna

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