Saturday, May 19, 2007

यही है आज का सच

उस पर उठा अंगुँली

इस से बच।

इस पर उठा अंगुँली

उस से बच।



कोई पूछे गर सवाल

उस से बच ।

सिर झुका कर कह-

"थैंक्यु वैरी मच"



यही है

आज का सच।

9 comments:

  1. कविता के लिए तुकबंदी का होना जरूरी नहीं है आप अपने भावों को कविता में बहने
    दीजिए -दीपक भारतदीप

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  2. तुकबन्दी या तुकान्त कविता 'गीत' बन जाती है और 'गेय' पाठ सहज याद हो जाता है। इस लुप्त होती 'विधा' को बचाए रखें।

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  3. आज आपने जो तुकबंदी की है वो बिलकुल सत्य है,.. मगर आपने जो लिखा की...

    उस पर उठा अंगुँली

    इस से बच।

    इस पर उठा अंगुँली

    उस से बच।
    बचेगा कैसे प्रभु?...जब आप किसी की और एक उन्गली उठाते है तो आपके हाथ कि तीन उन्गलीयाँ स्वतः ही आपकी और उठ जाती है,..
    जरा कर के तो देखीये आप किसी को ऐक गुना बदमाश कहेन्गे तो आपकी उन्गलीयाँ आपको तीन गुना कहेगी,....:)

    सुनीता चोटिया (शानू)

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  4. बात में दम है बाली जी ... मगर काव्य जिसके जीवन में उतर जाये .... वो तो बस आत्मा की आवाज़ ही सुन sakega

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  5. आपके दिल में एक कवि बसता है, आप जारी रखें-शब्द्लेख सारथी

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  6. गजब ! शब्दो ने काम किया ईसे कहते है

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  7. कम शब्दों में पूरी बात!!

    आप तो अपनी सुंदर कवितायें जारी रखो, हम तो वो ही पढ़ने आते हैं आपके दरवाजे. शुभकामनाऐं.

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  8. सत्य को अच्छे ढंगसे पेश किया है।

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  9. कोई पूछे गर सवाल

    उस से बच ।

    सिर झुका कर कह-

    "थैंक्यु वैरी मच"

    बहुत गूड पाठ सिखाया आपने आज्…शुक्रिया

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