Thursday, May 10, 2007

याद


रात के सन्नाटों में

अधमरे सायों के बीच

जब भी जग कर देखा

तुम नजर आई।


शायद यह मेरा भ्रम हो

लेकिन

तुम्हारी बातों का सिलसिला

एक कैंची बन कर

कल्पना के पंख काटकर

हकीकत मे रंगने वाला

झूठ कैसे कह दूँ-

मात्र सपना है!


नहीं

वह जो भूत के समान

सदा सिर पर सवार हो

दिल में हिलोरे मारती रहती है

तुम्हारी ही है

याद।


याद क्या है?

आज तक जाना ना था।

आज तुम्हीं ने कह दिया-

"अधूरा मिलन"


शायद ठीक कहा था

किसी ने

जीवन की सही परिभाषा-

याद ही है।

जो हम सभी को

सताती है

मिलाती है

हँसाती है

रूलाती है

भूत वर्तमान और भविष्य की

लड़ी है।

एक बार टूटने वाली

साँसों की कड़ी है

याद।

8 comments:

  1. बहुत सुंदर भव पूर्ण रचना,..यादो का विश्लेश्ण अच्छा किया है आपने।
    सुनीता(शानू)

    ReplyDelete
  2. बढ़िया. लिखते रहें.

    ReplyDelete
  3. भूतों कि तरह सर पे सवार यादें .... बढिया है ...

    ReplyDelete
  4. बढ़िया। रुचिकर रहा पढ़ना।

    ReplyDelete
  5. परमजीत जी आपकी रचनाएँ पिछले कुछ समय से नेट पर पढ रहा हूँ तथा आनंदित हो रहा हूँ। यदि संभव हो तो बैकग्राउंड के रंग पर पुनर्विचार कीजिएगा।

    ReplyDelete
  6. भाया, अच्छी कविता है ।या बात से हम भी सहमत है कि याद "अधूरा मिलन" ही होता है।

    याद क्या है?
    आज तक जाना ना था।
    आज तुम्हीं ने कह दिया-
    "अधूरा मिलन"

    ReplyDelete
  7. भाइजान, अच्छा लिखते हो।

    ReplyDelete
  8. परमजीत जी ब्लॉग पर आपसे मुलाकात अच्छी लगी।
    आपकी कविताएं भी पढ़ी, तारीफ-ए- काबिल।
    पुरक़ैफ़

    ReplyDelete

आप द्वारा की गई टिप्पणीयां आप के ब्लोग पर पहुँचनें में मदद करती हैं और आप के द्वारा की गई टिप्पणी मेरा मार्गदर्शन करती है।अत: अपनी प्रतिक्रिया अवश्य टिप्पणी के रूप में दें।